नई दिल्ली : दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई 'नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया' (NSUI) के शर्मनाक प्रदर्शन और करारी हार को लेकर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बेहद सख्त नजर आ रहा है। चुनाव में बड़ी जीत की उम्मीद लगाए बैठे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय नेतृत्व इस पराजय को पचा नहीं पा रहे हैं। इंदौर में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम खत्म करते ही राहुल गांधी ने दिल्ली के पार्टी नेताओं को फोन कर अपनी भारी नाराजगी व्यक्त की और हार का कारण जानने के लिए तुरंत 'पोस्टमार्टम' (विस्तृत समीक्षा) के निर्देश दिए। राहुल गांधी ने संगठन के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल से एक सप्ताह के भीतर पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
राहुल गांधी ने जताई नाराजगी, कहा- 'अनुकूल माहौल के बावजूद हार की जिम्मेदारी तय हो'
पार्टी सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेतृत्व ने दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में तैनात शीर्ष टीम और छात्र संगठन के प्रभारियों के कामकाज पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है।राहुल गांधी का मानना है कि दिल्ली के परिसरों में कांग्रेस और छात्र राजनीति के अनुकूल माहौल होने के बावजूद यह हार केवल और केवल संगठन के पदों पर बैठे नेताओं की लापरवाही का नतीजा है। सूत्रों का दावा है कि हार की समीक्षा के बाद छात्र संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।
एबीवीपी ने जीतीं तीन सीटें, एनएसयूआई का चारों केंद्रीय पदों पर हुआ सूपड़ा साफ
डूसू चुनाव के नतीजों में संघ समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पदों पर जीत दर्ज की। वहीं, एनएसयूआई चारों मुख्य पदों में से एक भी सीट हासिल करने में नाकाम रही।
- अध्यक्ष पद: एबीवीपी के यश डबास ने एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को हराया।
- उपाध्यक्ष पद: निर्दलीय चुनाव लड़े बागी प्रत्याशी दीपांशु शोकीन ने भारी मतों से जीत हासिल की।
- अन्य पद: सचिव और संयुक्त सचिव पदों पर भी एबीवीपी के प्रत्याशियों का कब्जा रहा।
- चुनाव के शुरुआती दौर (18-19 राउंड) तक कड़ा मुकाबला रहने के बाद अंतिम चरणों में वोट बंटने के कारण एनएसयूआई के प्रत्याशी पिछड़ गए, जिसका सीधा फायदा एबीवीपी को मिला।
कन्हैया कुमार और बिनोध जाखड़ की रणनीति पर उठे गंभीर सवाल
एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया कुमार और राष्ट्रीय अध्यक्ष बिनोद जाखड़ की चुनावी रणनीति, टिकट बंटवारे और पैनल चयन पर पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं।कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि शीर्ष नेतृत्व को भरोसा दिलाया गया था कि एनएसयूआई इस बार 'क्लीन स्वीप' करेगी। हालांकि, जमीनी धरातल पर गलत टिकट वितरण, प्रांतीय गुटबाजी और समन्वय की भारी कमी के कारण परिणाम पूरी तरह विपरीत रहे। कन्हैया कुमार और बिनोद जाखड़ के पर कतरे जाने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
बागी प्रत्याशी दीपांशु शोकीन की बंपर जीत ने खोली टिकट बंटवारे की पोल
हार का सबसे बड़ा कारण एनएसयूआई के पूर्व कार्यकर्ता दीपांशु शोकीन का बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ना रहा। शोकीन को एनएसयूआई से टिकट नहीं मिला तो उन्होंने उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल किया और जाट वोटों के भारी समर्थन से शानदार जीत हासिल की।कन्हैया समर्थकों के अनुसार, शोकीन को पहले अध्यक्ष और बाद में संयुक्त सचिव पद की पेशकश की गई थी, लेकिन अन्य समीकरणों के चलते बात नहीं बनी। एनएसयूआई ने उनकी जगह वीर चतरथ को मैदान में उतारा, जो बुरी तरह हार गए। शोकीन की एकतरफा जीत ने एनएसयूआई नेतृत्व के टिकट बंटवारे के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बागी को वापस लाने बनाम अनुशासनहीनता पर बंटी कांग्रेस की राय
दीपांशु शोकीन की प्रचंड जीत के बाद कांग्रेस के भीतर दो फाड़ की स्थिति देखने को मिल रही है।पार्टी का एक गुट व्यावहारिक रुख अपनाते हुए शोकीन को वापस कांग्रेस/एनएसयूआई के पाले में लाने का समर्थन कर रहा है, ताकि जाट वोट बैंक और छात्रों के बीच पकड़ बनी रहे। वहीं, एनएसयूआई के वर्तमान नेतृत्व का तर्क है कि निर्दलीय लड़कर संगठन के उम्मीदवार को हराना पार्टी विरोधी गतिविधि है और ऐसे फैसलों पर कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए।
तीन मुख्य बिंदुओं पर होगी हार की समीक्षा, जल्द होगी बड़ी कार्रवाई
केसी वेणुगोपाल ने प्रभारी कन्हैया कुमार से विफलता के कारणों पर लिखित जवाब मांगा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी द्वारा बुलाई जाने वाली समीक्षा बैठक में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं की पड़ताल की जाएगी:
- पराजय के मुख्य कारण: जमीनी स्तर पर वोट बैंक खिसकने की वजह।
- टिकट वितरण की प्रक्रिया: योग्य प्रत्याशियों को दरकिनार करने के पीछे की गलतियां।
- संगठनात्मक तालमेल: चुनाव प्रचार के दौरान छात्र नेताओं के बीच आपसी गुटबाजी और तालमेल का अभाव।
राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' अभियान के बीच राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में एनएसयूआई के इस शर्मनाक प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की फजीहत कराई है, जिसके बाद संगठन में बड़े फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं।