देश के सबसे बड़े और रंगीन त्योहारों में शामिल होली अब बेहद करीब है। 4 मार्च को पूरे भारत में रंग और गुलाल के साथ यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। हालांकि, ब्रज क्षेत्र में होली का उत्सव कई दिन पहले ही शुरू हो जाता है। खासकर बरसाना की होली अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के बरसाना में स्थित ‘श्री लाडली जी महाराज मंदिर’ में लड्डूमार और लठमार होली का विशेष आयोजन किया जाता है। यह प्राचीन मंदिर देवी राधा को समर्पित है, जहां श्री राधारानी (लाडली जी) और भगवान श्रीकृष्ण (लाल जी) की संयुक्त रूप से पूजा होती है। इसी कारण इसे ‘श्री लाडली जी महाराज मंदिर’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है नगर की प्रिय पुत्री और पुत्र।
250 मीटर ऊंचाई पर स्थित मंदिर
यह मंदिर बरसाना की प्रसिद्ध भानुगढ़ (ब्रह्मांचल) पहाड़ी की चोटी पर बना है। इसे ‘श्री जी मंदिर’ या ‘राधा रानी मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। करीब 250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 108 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
प्रमुख त्योहार और विशेष आयोजन
मंदिर में राधाष्टमी, जन्माष्टमी और विशेष रूप से लड्डूमार व लठमार होली बड़े उत्साह से मनाई जाती है। इन अवसरों पर मंदिर को फूलों से सजाया जाता है, राधा-कृष्ण को ‘छप्पन भोग’ अर्पित किया जाता है और भव्य आरती होती है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
लड्डूमार होली की परंपरा
लड्डूमार होली के दौरान मंदिर के पुजारी और भक्त हवा में लड्डू उछालते हैं। श्रद्धालु इन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह दृश्य बेहद आकर्षक और उल्लासपूर्ण होता है।
लठमार होली का ऐतिहासिक महत्व
लठमार होली में बरसाना की महिलाएं नंदगांव से आए पुरुषों पर प्रतीकात्मक रूप से लाठियां चलाती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं। यह परंपरा राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों को रंग लगाते थे, जिसके जवाब में सखियां उन्हें लाठियों से खदेड़ती थीं। इसी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा को आज भी बरसाना में पूरे उत्साह और आस्था के साथ जीवित रखा गया है। ब्रज की यह अनोखी होली विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
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