नई दिल्ली. देश की कृषि व्यवस्था में उर्वरकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्रत्येक फसल चक्र के दौरान उनकी समय पर उपलब्धता किसानों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों के उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण पिछले कुछ वर्षों में उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर कई चुनौतियां सामने आई हैं। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने संसद में उर्वरक क्षेत्र के लिए दस वर्षीय रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत किया है। इस योजना का उद्देश्य केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी सुदृढ़ व्यवस्था विकसित करना है जिससे वैश्विक संकटों का प्रभाव भारतीय किसानों तक न्यूनतम पहुंचे और कृषि क्षेत्र अधिक सुरक्षित तथा आत्मनिर्भर बन सके।
घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर रहेगा सबसे अधिक जोर
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार देश के भीतर उर्वरकों का उत्पादन बढ़ाना है। वर्ष 2014 के बाद लागू नई निवेश नीति के अंतर्गत छह आधुनिक यूरिया संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त तालचेर और असम में नए संयंत्रों का निर्माण कार्य जारी है। हाल ही में स्वीकृत राष्ट्रीय निवेश नीति फॉर यूरिया-2026 के माध्यम से सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि भविष्य में आयात पर निर्भरता क्रमशः कम की जा सके और किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जा सके।
ग्रीन अमोनिया बनेगा भविष्य की उर्वरक नीति का आधार
सरकार ने पहली बार राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को उर्वरक उद्योग से जोड़ते हुए ग्रीन अमोनिया के उत्पादन और उपयोग को विशेष प्राथमिकता दी है। पारंपरिक अमोनिया उत्पादन की तुलना में ग्रीन अमोनिया स्वच्छ ऊर्जा आधारित विकल्प माना जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ग्रीन अमोनिया उत्पादन में पर्याप्त क्षमता विकसित कर लेता है, तो भविष्य में उर्वरक क्षेत्र अधिक टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितताओं से अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकेगा।
बहुदेशीय आपूर्ति शृंखला से घटेगा वैश्विक जोखिम
नई रणनीति के अंतर्गत भारत किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय बहुदेशीय आपूर्ति प्रणाली विकसित कर रहा है। सरकार ने बताया कि डीएपी, पोटाश, रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक अम्ल और अमोनिया जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सऊदी अरब, रूस, जॉर्डन, मोरक्को, ओमान, ट्यूनीशिया, सेनेगल, टोगो, जर्मनी और तुर्कमेनिस्तान सहित अनेक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते किए गए हैं। इस नीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक अथवा आर्थिक संकट का असर भारत की उर्वरक आपूर्ति पर न्यूनतम रखना है।
वैश्विक संकटों से मिली सीख ने बदली सरकारी रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरियों को उजागर किया है। संसद में सरकार ने स्वीकार किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में उर्वरक उद्योग के संचालन के लिए विशेष व्यवस्थाएं करनी पड़ी थीं। इन अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल आयात आधारित व्यवस्था दीर्घकाल में सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। इसी कारण सरकार अब उत्पादन, ऊर्जा और कच्चे माल—तीनों स्तरों पर आत्मनिर्भरता की दिशा में दीर्घकालिक निवेश कर रही है।
किसानों की खाद सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगा दीर्घकालिक लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित दस वर्षीय रणनीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो इससे भारतीय कृषि क्षेत्र को अनेक स्तरों पर लाभ मिलेगा। घरेलू उत्पादन बढ़ने से उर्वरकों की उपलब्धता अधिक स्थिर होगी, आयात व्यय में कमी आएगी और वैश्विक मूल्य वृद्धि का प्रभाव किसानों पर सीमित रहेगा। साथ ही ग्रीन अमोनिया और आधुनिक उत्पादन तकनीकों के उपयोग से पर्यावरणीय स्थिरता को भी बल मिलेगा। बहुदेशीय आपूर्ति व्यवस्था और मजबूत वितरण तंत्र के माध्यम से देश की खाद सुरक्षा और अधिक सुदृढ़ होगी। आने वाले वर्षों में यह रणनीति भारत को उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ कृषि विकास, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।