भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 2028-29 अवधि की अस्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए अपना कूटनीतिक अभियान तेज कर दिया है। इस सीट के लिए ताजिकिस्तान भी मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है, जिससे चुनावी मुकाबला रोचक होने के साथ-साथ चुनौतीपूर्ण भी बन गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस सदस्यता के लिए चुनाव वर्ष 2027 में होंगे, जहां सदस्य देशों के समर्थन के आधार पर विजेता का फैसला होगा। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि यह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर प्रभाव, विश्वास और कूटनीतिक सक्रियता की भी परीक्षा होगी।
विदेश मंत्री के नेतृत्व में समर्थन जुटाने का अभियान तेज
भारत की ओर से इस अभियान का नेतृत्व विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर कर रहे हैं। हाल के महीनों में उन्होंने ओमान, कुवैत, कतर और बहरीन सहित कई खाड़ी देशों की यात्राएं कर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और भारत के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया है। इसके साथ ही कैरेबियाई देशों तथा अन्य क्षेत्रों के देशों के साथ भी सक्रिय संवाद बढ़ाया जा रहा है। विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के चुनावों में व्यापक कूटनीतिक संपर्क और विश्वास आधारित संबंध निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए भारत विभिन्न क्षेत्रों के देशों के साथ अपनी भागीदारी और सहयोग को और मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहा है।
ताजिकिस्तान की दावेदारी और ओआईसी का समर्थन बढ़ा रहा चुनौती
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह मानी जा रही है कि ताजिकिस्तान को इस्लामिक देशों के संगठन का समर्थन मिलने की बात सामने आई है। इससे चुनावी मुकाबला और अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है। हालांकि भारत और ताजिकिस्तान के बीच लंबे समय से मैत्रीपूर्ण तथा रणनीतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य एशिया में सामरिक साझेदारी जैसे कई क्षेत्रों में साथ मिलकर कार्य किया है। बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय चुनावों में प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय हितों और कूटनीतिक समीकरणों के आधार पर निर्णय लेता है, इसलिए भारत को व्यापक स्तर पर समर्थन सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।
कई देशों के साथ मजबूत संबंध भारत के लिए बन सकते हैं बड़ी ताकत
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत के अमेरिका, श्रीलंका, फिजी, ऑस्ट्रिया सहित अनेक देशों के साथ मजबूत और दीर्घकालिक संबंध इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, श्रीलंका के साथ पड़ोसी सहयोग, फिजी के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध तथा ऑस्ट्रिया के साथ दशकों पुराने राजनयिक रिश्ते भारत की वैश्विक स्वीकार्यता को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियाई क्षेत्र, प्रशांत द्वीपीय देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत की बढ़ती विकास साझेदारी भी समर्थन जुटाने में सहायक हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का अनुभव भी बनेगा मजबूत आधार
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य आठ बार रह चुका है और इस दौरान उसने वैश्विक शांति, आतंकवाद विरोधी सहयोग, विकासशील देशों की आवाज तथा बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता के कुछ वर्षों बाद 1950-51 में पहली बार भारत को यह जिम्मेदारी मिली थी। इसके बाद 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और 2021-22 में भी भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रहा। इस लंबे अनुभव ने भारत को वैश्विक कूटनीति में एक जिम्मेदार और विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित किया है, जिसे आगामी चुनाव में भी महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
वैश्विक नेतृत्व की दिशा में महत्वपूर्ण होगी यह चुनावी परीक्षा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता केवल दो वर्षों का कार्यकाल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी देश की कूटनीतिक विश्वसनीयता और प्रभाव का महत्वपूर्ण संकेतक भी मानी जाती है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार और स्थायी सदस्यता की मांग उठाता रहा है। ऐसे में 2028-29 की अस्थायी सदस्यता का चुनाव भी भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। यदि भारत व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने में सफल रहता है तो यह उसकी सक्रिय विदेश नीति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।