भारतीय वन सेवा की आधुनिक पहचान भले ही 1 जुलाई 1966 से जुड़ी हो, लेकिन भारत में संगठित वन प्रशासन की जड़ें इससे कहीं पुरानी हैं। वर्ष 1864 में जर्मनी के सर डाइट्रिख ब्रांडिस भारत के पहले वन महानिरीक्षक बने। उस दौर में जंगलों के अनियंत्रित दोहन की चुनौती के बीच उन्होंने वैज्ञानिक वन प्रबंधन की दिशा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धीरे-धीरे वन प्रशासन का उद्देश्य केवल लकड़ी के उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय जंगलों को व्यवस्थित संसाधन और दीर्घकालिक प्राकृतिक संपदा के रूप में देखने की ओर बढ़ा।
समय के साथ इस व्यवस्था में ऐसे व्यक्तित्व भी जुड़े, जिन्होंने वन संरक्षण की सोच को व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि दी। जिम कॉर्बेट इसका उल्लेखनीय उदाहरण रहे। आदमखोर जानवरों के शिकारी के रूप में पहचाने जाने वाले कॉर्बेट आगे चलकर वन्यजीव संरक्षण के समर्थक बने। उनके प्रयासों से भारत में वन्यजीव और प्राकृतिक आवासों की रक्षा की सोच को बल मिला और 1936 में देश के पहले राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान हुआ।
1966 में मिला अखिल भारतीय सेवा का आधुनिक स्वरूप
1 जुलाई 1966 को भारतीय वन सेवा को आधुनिक रूप में एक अखिल भारतीय सेवा के तौर पर स्थापित किया गया। इसके साथ वन प्रशासन को देश के व्यापक पर्यावरणीय शासन से जोड़ने का संस्थागत आधार मजबूत हुआ। वन अधिकारियों की भूमिका अब केवल वन क्षेत्र की निगरानी अथवा संसाधनों के प्रबंधन तक सीमित नहीं रही, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, वन्यजीवों के आवास बचाने और बदलती जलवायु से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने तक फैलती गई।
आज इस सेवा की वास्तविक परीक्षा उन क्षेत्रों में दिखाई देती है, जहां संरक्षण और मानवीय जरूरतें एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी होती हैं। कूनो राष्ट्रीय उद्यान के आसपास इसका उदाहरण देखा जा सकता है, जहां प्रोजेक्ट चीता के तहत अत्याधुनिक संरक्षण तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है। एक ओर सौर ऊर्जा आधारित स्मार्ट बाड़, तापीय कैमरे और उपग्रह निगरानी जैसी तकनीकें वन्यजीवों की सुरक्षा में मदद कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर आसपास के गांवों का दबाव प्राकृतिक संसाधनों के सामने नई चुनौती पैदा करता है।
जंगलों से आगे बढ़ा संरक्षण का नजरिया
भारत के पास दुनिया की कुल भूमि का करीब 2.2% हिस्सा है, जबकि यहां विश्व की लगभग 18% मानव आबादी और बड़ी संख्या में पशुधन मौजूद है। सीमित भूक्षेत्र पर इतनी बड़ी आबादी और पशुधन का दबाव प्राकृतिक संसाधनों के लिए लगातार चुनौती पैदा करता है। इसके बावजूद संगठित संरक्षण प्रयासों ने भारत को दुनिया के प्रमुख वन-संपन्न देशों की श्रेणी में बनाए रखने में मदद की है। खाद्य एवं कृषि संगठन के वैश्विक वन संसाधन आकलन के अनुसार भारत कुल वन क्षेत्र के मामले में दुनिया में 9वें स्थान पर है और वार्षिक शुद्ध वन आवरण वृद्धि के मामले में 3रे स्थान पर है।
देश के कुल भूभाग का करीब 25.17% हिस्सा वन आवरण से ढका है। यह हरित आवरण केवल जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की भारत की रणनीति का भी अहम हिस्सा है। भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसी व्यापक लक्ष्य के तहत 2030 तक अतिरिक्त 2.5 से 3 अरब टन CO2 समतुल्य कार्बन अवशोषण के लिए हरित आवरण बढ़ाने की योजना बनाई गई है।
1952 से 1988 तक बदली वन नीति की सोच
भारत की वन नीति में भी समय के साथ बड़ा बदलाव आया। वर्ष 1952 की राष्ट्रीय वन नीति में जंगलों को काफी हद तक व्यावसायिक संसाधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति थी। लेकिन वर्ष 1988 की राष्ट्रीय वन नीति ने इस दृष्टिकोण को बदलते हुए औद्योगिक हितों की तुलना में पारिस्थितिक संतुलन को अधिक महत्व दिया। यह बदलाव भारतीय वन प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और संरक्षण को नीति के केंद्र में लाने का रास्ता मजबूत हुआ।
इसी बदली सोच से 1990 में संयुक्त वन प्रबंधन की अवधारणा को बढ़ावा मिला। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण की प्रक्रिया से जोड़ना और उन्हें वन संसाधनों से मिलने वाले लाभों में भागीदारी देना था। इससे जंगलों और आसपास रहने वाले समुदायों के बीच संबंधों को केवल संघर्ष के नजरिये से देखने के बजाय साझेदारी और संरक्षण की दिशा में ले जाने का प्रयास हुआ। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और सहअस्तित्व की अवधारणा को मजबूत करने में यह सोच महत्वपूर्ण रही।
कानून से लेकर आधुनिक तकनीक तक मजबूत हुई हरित व्यवस्था
भारत में वन संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा भी लंबे समय से विकसित होता रहा है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 ने वन प्रशासन को कानूनी आधार देने और क्षेत्रीय स्तर पर अधिकारियों को प्रवर्तन की शक्तियां उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके जरिए वन क्षेत्रों की निगरानी और संरक्षण से जुड़े प्रशासनिक तंत्र को मजबूती मिली। बाद के दशकों में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की जरूरतों के अनुरूप संरक्षण व्यवस्था का दायरा लगातार विस्तृत हुआ।
आज वन सेवा का काम पारंपरिक वन प्रबंधन और कानून लागू करने से कहीं आगे निकल चुका है। कूनो जैसे क्षेत्रों में तापीय कैमरे, उपग्रह आधारित निगरानी और स्मार्ट बाड़ जैसी तकनीकें संरक्षण की नई तस्वीर पेश कर रही हैं। दूसरी ओर, आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर स्थलों के नेटवर्क का विस्तार भी प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहा है। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक वन प्रशासन में जंगल, वन्यजीव, आर्द्रभूमि, जलवायु और स्थानीय समुदाय एक-दूसरे से जुड़े हुए विषय बन चुके हैं।
60 साल बाद सबसे बड़ी चुनौती सहअस्तित्व की
भारतीय वन सेवा के 60 वर्ष पूरे होना केवल एक संस्थागत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत में संरक्षण की बदलती सोच का भी प्रतीक है। जहां शुरुआती दौर में जंगलों का प्रबंधन मुख्य रूप से संसाधन और लकड़ी की उपलब्धता से जुड़ा था, वहीं आज वन क्षेत्र जलवायु सुरक्षा, जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और मानव जीवन के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में देखे जाते हैं। इस बदलाव में वन सेवा की भूमिका लगातार विकसित हुई है।
फिर भी आने वाले समय की चुनौती आसान नहीं है। कूनो जैसे क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक और संरक्षण उपायों के साथ स्थानीय आबादी की जरूरतों का संतुलन बनाना होगा। बढ़ती आबादी, संसाधनों पर दबाव और बदलती जलवायु के बीच जंगलों को बचाने की जिम्मेदारी और अधिक जटिल होती जाएगी। ऐसे में भारतीय वन सेवा की अगली यात्रा केवल जंगलों की रक्षा तक सीमित नहीं होगी, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच ऐसा संतुलन कायम करने की होगी, जिसमें विकास के साथ पारिस्थितिक सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।