श्रीहरिकोटा. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लिए 4 सितंबर की तड़के होने वाला GSLV-F17 मिशन बेहद महत्वपूर्ण है। संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार रॉकेट को सुबह 2:55 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे प्रक्षेपण परिसर से रवाना किया जाना है। यह GSLV की 19वीं उड़ान होगी और इसके माध्यम से EOS-05 को उप-भू-समकालिक अंतरण कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद उपग्रह अपनी प्रणोदन प्रणाली के जरिए निर्धारित भू-समकालिक कक्षा तक पहुंचेगा।
यह मिशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लगभग 7 महीने के अंतराल के बाद इसरो की वापसी वाली प्रमुख उड़ानों में से एक है। EOS-05 कोई सामान्य पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह नहीं है। इसे भू-समकालिक कक्षा से बड़े क्षेत्र की लगातार निगरानी और बार-बार चित्र लेने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस कक्षा की विशेषता यह है कि उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन के साथ तालमेल बनाए रख सकता है, जिससे एक ही क्षेत्र का नियमित अवलोकन संभव होता है।
PSLV की 2 नाकामियों के बाद क्यों बढ़ गया है दबाव?
GSLV-F17 की उड़ान ऐसे समय हो रही है जब इसरो को हाल के 2 PSLV मिशनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। 18 मई 2025 को PSLV-C61 के EOS-09 मिशन में तीसरे चरण के ठोस मोटर में विसंगति सामने आई और मिशन पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 के EOS-N1 मिशन में भी तीसरे चरण के दौरान विसंगति आई। इसरो के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक दोनों घटनाओं की जांच के लिए राष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञ समिति गठित की गई और सुधारात्मक कदम उठाए गए।
इसलिए GSLV-F17 की सफलता पर स्वाभाविक रूप से विशेष ध्यान है, लेकिन यह कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा कि यह मिशन सीधे PSLV की उन विफलताओं का जवाब है। दोनों प्रक्षेपण यानों की संरचना और मिशन भूमिका अलग हैं। GSLV में क्रायोजेनिक ऊपरी चरण इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है, जबकि PSLV मुख्य रूप से ध्रुवीय और निम्न पृथ्वी कक्षाओं में उपग्रह पहुंचाने के लिए जाना जाता है। इसरो की अपनी जानकारी के अनुसार GSLV की दूसरी अवस्था में प्रयुक्त विकास इंजन PSLV की तकनीक से निकला है, लेकिन इसकी अंतिम क्रायोजेनिक अवस्था इसे अलग तकनीकी श्रेणी में रखती है।
‘नॉटी बॉय’ नाम के पीछे छिपी है GSLV की मुश्किल कहानी
GSLV को शुरुआती दौर में अपने अस्थिर प्रदर्शन के कारण अनौपचारिक तौर पर ‘नॉटी बॉय’ कहा गया। इसके शुरुआती मिशनों में कई असफलताएं और तकनीकी चुनौतियां सामने आईं, जिसके कारण इस रॉकेट के प्रत्येक प्रक्षेपण के साथ एक खास स्तर की सावधानी जुड़ी रही। हालांकि पिछले वर्षों में GSLV ने उल्लेखनीय परिपक्वता हासिल की है और स्वदेशी क्रायोजेनिक चरण के साथ लगातार सफल उड़ानों ने इसकी विश्वसनीयता को मजबूत किया है।
इसरो के आधिकारिक विवरण के अनुसार स्वदेशी क्रायोजेनिक ऊपरी चरण को GSLV में जनवरी 2014 से शामिल किया गया और GSLV-D5 के बाद वाहन ने लगातार 6 सफल उड़ानें पूरी कीं। इसका अर्थ यह है कि पुराने असफलताओं के इतिहास को वर्तमान GSLV की तकनीकी क्षमता का अकेला पैमाना मानना उचित नहीं होगा। आज का GSLV उस लंबे तकनीकी विकास, परीक्षण और सुधार का परिणाम है, जिसने भारत को भारी उपग्रहों को भू-समकालिक अंतरण कक्षा की दिशा में भेजने की क्षमता दी है।
क्रायोजेनिक तकनीक के लिए भारत को क्यों करनी पड़ी लंबी जद्दोजहद?
GSLV की कहानी केवल एक रॉकेट के विकास की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत की स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक हासिल करने की लंबी वैज्ञानिक यात्रा भी छिपी है। 1990 के दशक में भारत ने रूस से क्रायोजेनिक तकनीक हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका की आपत्तियों और मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था से जुड़े विवाद के कारण तकनीक हस्तांतरण पर रोक की स्थिति पैदा हुई। इसके बाद भारत को इस अत्यंत जटिल तकनीक को स्वयं विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।
क्रायोजेनिक इंजन सामान्य रॉकेट इंजन की तुलना में बेहद जटिल होता है क्योंकि इसमें अत्यंत कम तापमान पर रखे जाने वाले तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल किया जाता है। इसरो के अनुसार तरल ऑक्सीजन लगभग -183 डिग्री सेल्सियस और तरल हाइड्रोजन लगभग -253 डिग्री सेल्सियस पर रहता है। इन प्रणोदकों को संभालने, पंप करने और इंजन में नियंत्रित तरीके से जलाने के लिए अत्यंत जटिल प्रणालियों की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक का विकास भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बड़ी तकनीकी उपलब्धियों में गिना जाता है।
EOS-05 क्यों है इतना खास?
इस पूरे मिशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा EOS-05 है। इसरो के अनुसार यह भारत का पहला ऐसा पृथ्वी-अवलोकन इमेजिंग उपग्रह है, जिसे भू-समकालिक कक्षा से काम करने के लिए तैयार किया गया है। सामान्य निम्न पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हुए उसकी तस्वीर लेते हैं और फिर कुछ समय बाद दोबारा उस क्षेत्र के ऊपर आते हैं। इसके विपरीत भू-समकालिक कक्षा में स्थित उपग्रह किसी बड़े क्षेत्र को लगातार और अधिक नियमित अंतराल पर देख सकता है।
लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली भू-समकालिक कक्षा की यही विशेषता EOS-05 को महत्वपूर्ण बनाती है। इतनी ऊंचाई से एक ही व्यापक क्षेत्र की बार-बार निगरानी की जा सकती है। इससे मौसम संबंधी घटनाओं, बाढ़, चक्रवात, जंगल की आग, कृषि और पर्यावरणीय बदलावों जैसे क्षेत्रों में उपयोगी आंकड़े हासिल करने की क्षमता बढ़ सकती है। रणनीतिक दृष्टि से भी ऐसी क्षमता महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़े भूभाग की लगातार निगरानी करने में अंतरिक्ष आधारित प्रणालियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सीमाओं से लेकर आपदा प्रबंधन तक, कहां-कहां आएगा काम?
EOS-05 की क्षमता का महत्व केवल राष्ट्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है। भू-समकालिक कक्षा से लगातार बड़े क्षेत्र को देखने की क्षमता मौसम और आपदा प्रबंधन के लिए भी उपयोगी हो सकती है। किसी चक्रवात के विकसित होने, बादलों की गतिविधि, बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र या जंगल में लगी आग जैसे बड़े पैमाने के बदलावों को अधिक नियमित रूप से देखने की सुविधा मिल सकती है। इससे संबंधित एजेंसियों को स्थिति का आकलन करने और राहत एवं बचाव की तैयारी में मदद मिल सकती है।
कृषि और पर्यावरण निगरानी में भी इस प्रकार के उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों का महत्व बढ़ सकता है। फसलों की स्थिति, भूमि उपयोग में बदलाव और बड़े क्षेत्र में होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी के लिए लगातार पृथ्वी-अवलोकन उपयोगी है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि उपग्रह अपने आप किसी क्षेत्र में कार्रवाई नहीं करता; उसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि उससे मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण संबंधित सरकारी और वैज्ञानिक संस्थाएं कितनी तेजी और सटीकता से करती हैं।
क्या यह सचमुच 24 घंटे भारत की हर गतिविधि देख पाएगा?
EOS-05 को लेकर सबसे अधिक चर्चा इसकी निगरानी क्षमता को लेकर है। भू-समकालिक कक्षा में उपग्रह का किसी बड़े क्षेत्र पर लंबे समय तक नजर बनाए रखना संभव है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के हर हिस्से की हर गतिविधि को हर सेकंड देख सकता है। भू-समकालिक कक्षा का लाभ मुख्य रूप से बड़े क्षेत्र के बार-बार अवलोकन में है। उपग्रह की वास्तविक क्षमता उसके उपकरणों, देखने के क्षेत्र, चित्रों के प्रकार और संचालन संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
इसलिए इसे भारत के लिए अंतरिक्ष से मिली एक नई निगरानी क्षमता कहना अधिक उचित होगा, न कि ऐसी सर्वशक्तिमान ‘आंख’ जो हर जगह और हर समय हर चीज देख सकती है। फिर भी बड़े क्षेत्र की निरंतर निगरानी की क्षमता पृथ्वी-अवलोकन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण छलांग है। खासकर ऐसे देश के लिए जिसकी भौगोलिक सीमाएं लंबी हैं और जहां बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन तथा जंगल की आग जैसी प्राकृतिक घटनाओं की नियमित निगरानी आवश्यक होती है।
GSLV-F17 की सफलता क्यों बनेगी बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश?
इस मिशन की सफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए केवल एक और सफल प्रक्षेपण का आंकड़ा नहीं होगी। हाल के PSLV-C61 और PSLV-C62 मिशनों में आई तकनीकी समस्याओं के बाद इसरो पहले ही सुधार प्रक्रिया और परीक्षणों पर जोर दे रहा है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार PSLV की तीसरी अवस्था के संशोधित मोटर के 2 स्थैतिक परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरे किए गए हैं। ऐसे वातावरण में GSLV-F17 का सफल प्रदर्शन इसरो के प्रक्षेपण कार्यक्रम में भरोसे को और मजबूत करने वाला संकेत होगा।
हालांकि अंतरिक्ष अभियानों में सफलता और विफलता दोनों वैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। किसी एक मिशन की सफलता या असफलता से पूरे संगठन की क्षमता का अंतिम आकलन करना उचित नहीं होता। इसरो का इतिहास दिखाता है कि तकनीकी चुनौतियों के बाद सुधार, पुनर्रचना और दोबारा परीक्षण के जरिए प्रणालियों को अधिक सक्षम बनाया जाता रहा है। इसलिए GSLV-F17 की असली परीक्षा केवल रॉकेट के उड़ान भरने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि EOS-05 को निर्धारित कक्षा तक सही तरीके से पहुंचाने और उसके बाद उपग्रह के सफल संचालन तक चलेगी।
‘नॉटी बॉय’ के सामने अब सबसे बड़ा इम्तिहान
GSLV-F17 के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि इस उड़ान में भारत की पृथ्वी-अवलोकन क्षमता का एक महत्वपूर्ण नया अध्याय जुड़ा है। रॉकेट को EOS-05 को उपयुक्त अंतरण कक्षा में पहुंचाना होगा, जिसके बाद उपग्रह को अपनी प्रणोदन प्रणाली के जरिए अंतिम भू-समकालिक कक्षा तक जाना है। इस पूरे क्रम में रॉकेट के प्रत्येक चरण, मार्गदर्शन प्रणाली, प्रणोदन और उपग्रह की पृथक्करण प्रक्रिया का सही तरीके से काम करना जरूरी है।
4 सितंबर की तड़के 2:55 बजे श्रीहरिकोटा से उठने वाला यह रॉकेट इसलिए भी खास होगा क्योंकि इसके साथ भारत की अंतरिक्ष निगरानी क्षमता एक नई दिशा में कदम रखेगी। कभी अस्थिर प्रदर्शन के कारण ‘नॉटी बॉय’ कहे जाने वाला GSLV अब एक ऐसे मिशन को अंजाम देने जा रहा है, जिसका वैज्ञानिक और रणनीतिक महत्व दोनों हैं। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो EOS-05 लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर से भारत और आसपास के व्यापक क्षेत्र के नियमित अवलोकन की नई क्षमता स्थापित करेगा।