नई दिल्ली:देश की राजनीति और लोकतांत्रिक ढांचे को पूरी तरह बदलने के उद्देश्य से लाया गया केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी 'लोकसभा पुनर्विन्यास बिल, 2026' (Delimitation Bill 2026) संसद में गिर गया है। लोकसभा में सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने और देश में नए सिरे से चुनावी सीमाओं को तय करने वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने में मोदी सरकार विफल रही।संसद में हुए ऐतिहासिक मतदान के दौरान इस बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष ने इसके खिलाफ 230 वोट डाले। संविधान संशोधन के लिए सरकार को सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (कुल 362 वोट) बहुमत चाहिए था, लेकिन जरूरी आंकड़ा न जुटने के कारण केंद्र सरकार को यह बिल वापस लेना पड़ा।
क्या है परिसीमन (Delimitation) और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
सरल शब्दों में कहें तो जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और राज्यों की विधानसभा सीटों की सीमाओं को दोबारा तय करने की प्रक्रिया को परिसीमन कहा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत हर जनगणना के बाद यह प्रक्रिया अनिवार्य है। भारत में आखिरी बार 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का निर्धारण हुआ था।
1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए इस पर रोक लगा दी गई थी, ताकि जिन राज्यों ने आबादी नियंत्रित की है, उन्हें राजनीतिक नुकसान न हो। बाद में 2001 में 84वें संशोधन द्वारा इस रोक को बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया था। इसी समयसीमा के खत्म होने पर सरकार यह नया बिल लेकर आई थी।
सरकार क्यों पास कराना चाहती थी यह बिल?
कानून और न्याय मंत्रालय द्वारा पेश किए गए इस बिल के पीछे सरकार ने कई बड़े तर्क दिए थे:
- वोटों की समानता: वर्तमान में अलग-अलग क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी अंतर है। परिसीमन से हर क्षेत्र में जनसंख्या का अनुपात बराबर होता और 'एक वोट, एक मूल्य' का सिद्धांत मजबूत होता।
- महिला आरक्षण का रास्ता: संसद में महिलाओं के लिए 33% (एक-तिहाई) आरक्षण लागू करने के लिए सीटों का नए सिरे से निर्धारण बेहद जरूरी कदम है।
- लोकतांत्रिक आधार का विस्तार: सीटें बढ़ने से सांसदों की संख्या बढ़ती, जिससे जनता को सीधे अपने प्रतिनिधियों से जुड़ने और बेहतर प्रशासनिक सुविधाएं मिलने में आसानी होती।
दक्षिण बनाम उत्तर भारत का विवाद और अमित शाह का दावा
इस बिल को लेकर देश में लंबे समय से 'उत्तर बनाम दक्षिण' का विवाद चल रहा है। दक्षिण भारत के राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, इसलिए सीटें बढ़ने पर उत्तर भारत (जैसे यूपी, बिहार) को उनकी तुलना में ज्यादा सीटें मिलेंगी और केंद्र की राजनीति में दक्षिण का महत्व कम हो जाएगा।सदन में बहस का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इन आशंकाओं को खारिज किया था। उन्होंने दावा किया कि नए परिसीमन से दक्षिण के राज्यों को भी बड़ा फायदा होगा:
राज्य परिसीमन के बाद मिलने वाली अतिरिक्त सीटें
तमिलनाडु +20 सीटें
अंध्र प्रदेश +13 सीटें
केरल +10 सीटें
तेलंगाना +9 सीटें
महाराष्ट्र +24 सीटें
अब आगे क्या? 2031 की जनगणना पर टिकी नजरें
इस बिल के गिरने के बाद अब तत्काल परिसीमन की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। अब अगला परिसीमन 2031 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, अगर मौजूदा जनसंख्या रुझान जारी रहा, तो भविष्य में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 753 हो सकती हैं। इसमें उत्तर भारत की सीटें 222 से बढ़कर 357 हो जाएंगी, जबकि दक्षिण के राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 144 तो होंगी, लेकिन संसद में उनका कुल हिस्सा 23.7% से घटकर 19% रह जाएगा। यही वो गणित है, जिसके कारण इस बिल पर विपक्ष लामबंद था और अंततः सरकार इसे पास कराने में असफल रही।