इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि पत्नी का पढ़ा-लिखा या प्रोफेशनल डिग्रीधारी होना पति की जिम्मेदारी को स्वतः समाप्त नहीं करता। अदालत ने साफ कहा कि कानून संभावनाओं पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों और आय पर आधारित होता है। इस फैसले ने उन पतियों को स्पष्ट संदेश दिया है जो केवल पत्नी की शैक्षणिक योग्यता का हवाला देकर मेंटेनेंस से बचने की कोशिश करते हैं।
योग्यता और रोजगार के बीच स्पष्ट अंतर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि किसी महिला का शिक्षित होना और उसका वास्तव में नौकरी में होना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने कहा कि जब तक पत्नी के पास वास्तविक आय का कोई ठोस स्रोत नहीं है, तब तक उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण महिलाएं अक्सर अपने करियर से लंबा ब्रेक लेती हैं, जिससे दोबारा रोजगार पाना आसान नहीं होता।
रूढ़िवादी सोच पर अदालत की सख्ती
कोर्ट ने पतियों की उस सामान्य दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा जाता है कि पढ़ी-लिखी पत्नी खुद कमा सकती है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस सोच को अव्यावहारिक और सामाजिक वास्तविकताओं से कटे हुए बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल डिग्री का होना पत्नी को स्वतः कमाने वाला नहीं बना देता और पति पर यह दायित्व है कि वह पत्नी की वास्तविक आय को साबित करे।
बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार
यह मामला बुलंदशहर की एक महिला से जुड़ा था, जिसकी मेंटेनेंस याचिका फैमिली कोर्ट ने प्रोफेशनल डिग्री के आधार पर खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि महिला ने ससुराल में कथित प्रताड़ना के कारण घर छोड़ा था, जो अलग रहने का वैध और कानूनी आधार है। अदालत ने माना कि केवल यह कहना कि महिला शिक्षित है, उसके अधिकारों को नकारने का कारण नहीं बन सकता।
बच्चे के अधिकार और महंगाई की हकीकत
हाईकोर्ट ने बच्चे के लिए तय किए गए मात्र 3,000 रुपये के मेंटेनेंस को आज के महंगाई भरे दौर में अपर्याप्त बताया। अदालत ने कहा कि बच्चे के सम्मानजनक पालन-पोषण की जिम्मेदारी पिता की है और इसे प्रतीकात्मक राशि तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि मेंटेनेंस तय करते समय वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फैसले का व्यापक सामाजिक संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों मामलों के लिए मार्गदर्शक है जहां पढ़ी-लिखी महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने की कोशिश होती है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि कानून महिला और बच्चे को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है और शिक्षा को पति की जिम्मेदारी से बचने का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता।
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