नई दिल्ली: क्या पासपोर्ट केवल विदेश यात्रा करने का एक जरिया है, या यह इस देश का नागरिक होने का सबसे बड़ा कानूनी दस्तावेज भी है? अब तक आम जनता के मन में इसे लेकर कोई संशय नहीं था, लेकिन विदेश मंत्रालय (MEA) के एक वरिष्ठ अधिकारी के हालिया बयान ने इस विषय पर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है।
'पासपोर्ट सिर्फ एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है'
हाल ही में 24 जून को आयोजित 'पासपोर्ट सेवा दिवस' के एक कार्यक्रम में अधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है। इसे किसी भी स्थिति में नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि विदेशों में रहने के दौरान यह किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता (Nationality) को जरूर दर्शाता है, लेकिन देश के भीतर नागरिक अधिकारों को साबित करने के लिए इसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।
इस बयान के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। विपक्षी नेताओं ने सरकार को घेरते हुए पूछा है कि कड़े पुलिस वेरिफिकेशन और गहन सरकारी जांच-पड़ताल के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट अगर नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आम आदमी खुद को भारतीय साबित करने के लिए कौन सा कागज दिखाएगा?
संसद से लेकर सोशल मीडिया तक तीखी प्रतिक्रिया
मतदाता सूची (Voter List) में संशोधन के चल रहे काम के बीच आए इस बयान पर राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग करते हुए पूछा कि क्या इस तरह की व्याख्याओं के जरिए आम जनता को उनके मताधिकार से वंचित करने की बिसात बिछाई जा रही है?वहीं, एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने भी इस रुख को पूरी तरह अतार्किक और आम समझ से परे बताते हुए सरकार पर तीखा तंज कसा है।
सरकार ने दी 1967 के कानून की दलील
विवाद को बढ़ता देख केंद्र सरकार ने 25 जून को स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। सरकार की ओर से 'पासपोर्ट अधिनियम, 1967' की एक विशेष धारा का हवाला देते हुए कहा गया कि कानूनन, सरकार जनहित में किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है। सरकार की इस सफाई ने भ्रम को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया है कि आखिर भारत में नागरिकता तय करने का अंतिम पैमाना क्या है?
तो फिर नागरिकता साबित कैसे होगी?
कानूनी विशेषज्ञों और एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में कोई भी एक अकेला पहचान पत्र नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं हो सकता। 'नागरिकता अधिनियम, 1955' के तहत भारत की नागरिकता मुख्य रूप से पांच तरीकों से मिलती है, जिसमें जन्म और वंशक्रम सबसे प्रमुख हैं। उदाहरण के लिए, 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति कानूनन यहाँ का नागरिक है। इसके अलावा, देश से बाहर जन्म लेने वाले लोग अपने माता-पिता के भारतीय होने के आधार पर या लगातार 12 वर्षों तक भारत में रहने के बाद स्वाभाविक रूप से (Naturalization) नागरिकता पा सकते हैं।
राष्ट्रीयता (Nationality) और नागरिकता (Citizenship) का फर्क: विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीयता व्यक्ति के जन्म, संस्कृति और मूल पहचान से जुड़ी होती है, जिसे बदला नहीं जा सकता (जैसे कोई भारतीय यदि अमेरिकी नागरिक बन जाए, तब भी उसकी राष्ट्रीयता भारतीय ही रहेगी)। इसके विपरीत, नागरिकता किसी देश की सरकार और व्यक्ति के बीच का एक कानूनी अनुबंध है। गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, हमारे दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाले अन्य दस्तावेज जैसे निवास का प्रमाण देते हैं, नागरिकता का अंतिम दस्तावेज नहीं।
पासपोर्ट जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित और सुरक्षित दस्तावेज को लेकर उपजे इस कानूनी और राजनीतिक विवाद ने आम जनता को एक गहरी चिंता और असमंजस के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।