प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को उज्बेकिस्तान के 2 दिवसीय दौरे के लिए रवाना हुए। यह यात्रा उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव के निमंत्रण पर हो रही है और इसका मकसद दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना है। ताशकंद में प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति मिर्जियोयेव के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता करेंगे, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के मौजूदा स्वरूप की समीक्षा के साथ भविष्य के सहयोग की दिशा तय की जाएगी। इसके बाद 31 अगस्त को प्रधानमंत्री किर्गिस्तान की यात्रा पर जाएंगे। इस तरह उनका मध्य एशिया दौरा भारत की क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत मध्य एशियाई देशों के साथ आर्थिक, रणनीतिक और संपर्क संबंधों को लगातार विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। उज्बेकिस्तान इस क्षेत्र में भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। ताशकंद में होने वाली बातचीत केवल मौजूदा समझौतों की समीक्षा तक सीमित रहने के बजाय आने वाले वर्षों में दोनों देशों की प्राथमिकताओं को एक-दूसरे के साथ जोड़ने पर केंद्रित रहने की उम्मीद है। मध्य एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत के लिए उज्बेकिस्तान के साथ मजबूत संबंधों का रणनीतिक महत्व भी लगातार बढ़ रहा है।
व्यापार, निवेश और ऊर्जा पर रहेगा खास जोर
विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मिर्जियोयेव व्यापार एवं निवेश, रक्षा, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी, शिक्षा और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा करेंगे। इन क्षेत्रों में मौजूदा उपलब्धियों के आधार पर आगे की राह का एजेंडा तैयार किया जा सकता है। भारत के लिए मध्य एशिया के बाजारों तक पहुंच और उज्बेकिस्तान के लिए भारतीय निवेश तथा तकनीकी विशेषज्ञता दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में आर्थिक सहयोग को और व्यापक बनाने पर बातचीत का विशेष महत्व होगा। दोनों पक्ष नई साझेदारियों, निवेश के अवसरों और कारोबारी संपर्कों को बढ़ाने के तरीकों पर भी विचार कर सकते हैं।
इस बातचीत में अहम खनिजों और उभरती तकनीकों से जुड़े क्षेत्र भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और डिजिटल बुनियादी ढांचे की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। भारत अपनी औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के लिए विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना चाहता है, जबकि मध्य एशियाई देश भी नए आर्थिक साझेदारों की तलाश में हैं। ऐसे में उज्बेकिस्तान के साथ सहयोग को केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और संसाधनों से जुड़े क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश की जा सकती है।
'विकसित भारत 2047' और 'उज्बेकिस्तान-2030' पर भी नजर
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मिर्जियोयेव की बातचीत में दोनों देशों के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के बीच तालमेल बनाने पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। भारत का 'विकसित भारत 2047' का लक्ष्य देश को दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में आगे ले जाने से जुड़ा है, जबकि उज्बेकिस्तान ने 'उज्बेकिस्तान-2030' के माध्यम से अपने विकास की प्राथमिकताएं तय की हैं। दोनों देशों के इन लक्ष्यों के बीच सहयोग के अवसर तलाशना द्विपक्षीय संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने का आधार बन सकता है। इसके तहत निवेश, प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान ताशकंद में कुछ महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा भी प्रस्तावित है। इनमें शास्त्री मेमोरियल और ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में महात्मा गांधी सेंटर शामिल हैं। इन यात्राओं का महत्व केवल औपचारिक नहीं है, बल्कि भारत और उज्बेकिस्तान के बीच ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित करता है। मध्य एशिया के साथ भारत के संबंध व्यापार और रणनीतिक सहयोग के साथ-साथ सभ्यतागत संपर्कों पर भी आधारित रहे हैं। ऐसे कार्यक्रम दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संबंधों को और मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं।
उज्बेकिस्तान का चौथा दौरा, एससीओ से भी जुड़ी कड़ी
विदेश मंत्रालय के सचिव पश्चिम सिबी जॉर्ज के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का यह उज्बेकिस्तान का चौथा दौरा होगा। इससे पहले वह 2015 में उज्बेकिस्तान और मध्य एशिया के अन्य देशों की यात्रा कर चुके हैं। इसके बाद 2016 और 2022 में वह शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए उज्बेकिस्तान गए थे। इस बार की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की मध्य एशिया नीति और बहुपक्षीय कूटनीति दोनों को एक साथ आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है।
एससीओ के मंच पर भारत लंबे समय से क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबले, आर्थिक सहयोग और संपर्क व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता देता रहा है। मध्य एशिया के देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंधों में एससीओ की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऐसा मंच है जहां भारत को क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ सीधे संवाद का अवसर मिलता है। प्रधानमंत्री मोदी का उज्बेकिस्तान दौरा इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के साथ बहुपक्षीय सहयोग को भी मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों में तेजी से बढ़ा आर्थिक सहयोग
भारत और उज्बेकिस्तान के बीच पिछले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संपर्क के साथ व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, फार्मास्युटिकल, कृषि, शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा है। उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव ने 2018 में भारत की राजकीय यात्रा की थी और 2019 में वह वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट में भी शामिल हुए थे। इन उच्चस्तरीय संपर्कों ने दोनों देशों के बीच कारोबारी और निवेश संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूत आधार तैयार किया है।
उज्बेकिस्तान में भारत की राजदूत स्मिता पंत ने प्रधानमंत्री की यात्रा को व्यापक एजेंडे वाली यात्रा बताया है। उनके अनुसार 2015 की पिछली द्विपक्षीय यात्रा के बाद से व्यापार और निवेश सहित कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उन्होंने बताया कि इस अवधि में दोनों देशों के बीच व्यापार में 300% की वृद्धि हुई है, जबकि उज्बेकिस्तान में भारतीय निवेश 700% से अधिक बढ़ा है। उनके अनुसार विकास सहयोग के अलावा संस्कृति, फार्मास्युटिकल क्षेत्र, स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, कृषि और वित्तीय प्रौद्योगिकी से जुड़े क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं मौजूद हैं।
मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक मौजूदगी का विस्तार
उज्बेकिस्तान के साथ मजबूत संबंध भारत की व्यापक मध्य एशिया रणनीति के लिए भी अहम हैं। यह क्षेत्र भारत को ऊर्जा, व्यापार, परिवहन, खनिज संसाधनों और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। दूसरी ओर, मध्य एशियाई देशों के लिए भारत एक बड़ा बाजार, निवेश स्रोत और तकनीकी साझेदार बन सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा दोनों पक्षों के लिए आर्थिक हितों को रणनीतिक साझेदारी के साथ जोड़ने का अवसर है। खासकर डिजिटल कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य, शिक्षा और फार्मास्युटिकल जैसे क्षेत्रों में भारत की विशेषज्ञता उज्बेकिस्तान के साथ सहयोग का आधार बन सकती है।
प्रधानमंत्री की उज्बेकिस्तान यात्रा के बाद किर्गिस्तान जाना भी इस पूरे दौरे को व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ देता है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत मध्य एशिया को अपनी विदेश नीति में लगातार अधिक महत्व दे रहा है। ताशकंद में द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने और एससीओ के मंच पर क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने के बाद किर्गिस्तान में संपर्क भारत की इस रणनीति को और व्यापक बनाएगा। आने वाले समय में व्यापार, निवेश, सुरक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में इन संबंधों की दिशा यह तय करेगी कि भारत और मध्य एशिया के बीच साझेदारी कितनी गहराई तक जाती है।