गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य का निर्णय अकाट्य होता है और उसे सर्वोच्च न्यायालय तक मान्यता देता है। इस बयान को धर्माचार्यों की परंपरागत गरिमा और पीठ की सर्वोच्चता के संदर्भ में देखा जा रहा है।
विधिवत प्रकरण आने पर ही निर्णय का संकेत
पुरी शंकराचार्य ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कोई मामला विधिवत रूप से उनके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक वे उस पर टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान विवाद औपचारिक रूप से उनके पास नहीं आया है, इसलिए अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। यह वक्तव्य उनकी न्यायप्रिय और संतुलित भूमिका को दर्शाता है।
‘अविमुक्तेश्वरानंद मेरे लाडले हैं’—संकेतों में समर्थन
हालांकि प्रत्यक्ष रूप से विवाद पर बोलने से बचते हुए भी पुरी शंकराचार्य ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अपना ‘लाडला’ बताया। इस कथन को आध्यात्मिक जगत में एक मजबूत नैतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि मेला प्रशासन को अपना काम करना चाहिए, जिससे धार्मिक गतिविधियों में अनावश्यक टकराव न हो।
माघ मेले में शिविर और मौन समर्थन का दृश्य
माघ मेले के दौरान त्रिवेणी मार्ग पर पुरी पीठाधीश्वर और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर आमने-सामने लगे हुए हैं। मौनी अमावस्या के बाद संगम नोज स्नान को लेकर हुए विवाद के बीच पुरी शंकराचार्य का यह संतुलित रुख साधु-संत समाज में विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है।
प्रणाम का प्रतीकात्मक संदेश और गुरु-शिष्य परंपरा
विवाद के तीसरे दिन गौ रक्षा यात्रा के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पुरी पीठाधीश्वर के शिविर के सामने रुककर उन्हें प्रणाम किया। पालकी से उतरकर किया गया यह प्रणाम केवल औपचारिक नहीं, बल्कि शंकराचार्य परंपरा में मर्यादा, सम्मान और आध्यात्मिक अनुशासन का गहरा संकेत माना जा रहा है।
परंपरा, मर्यादा और आध्यात्मिक संतुलन
पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि शंकराचार्य परंपरा में निर्णय, संवाद और सम्मान का विशेष स्थान है। पुरी शंकराचार्य का बयान न केवल संस्थागत गरिमा को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि किसी भी विवाद का समाधान परंपरा और शास्त्रीय मर्यादा के भीतर ही होना चाहिए।
Comments (0)