वैश्विक जलवायु प्रणाली एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां प्रकृति का संतुलन गंभीर चुनौती का सामना कर सकता है। मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों के नवीनतम आकलनों ने संकेत दिया है कि आगामी अल नीनो घटना असाधारण रूप से शक्तिशाली हो सकती है। यदि यह अनुमान वास्तविकता में बदलता है तो पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में तापमान वृद्धि के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं। इसके प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता, ऊर्जा मांग और मानव स्वास्थ्य तक व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है जो प्रशांत महासागर में विकसित होता है और वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन प्रणाली का गर्म चरण माना जाता है। इसके दौरान मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के जल का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। समुद्र की सतह का यह अतिरिक्त ताप वातावरण में ऊर्जा का संचार करता है, जिससे दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा, सूखा, तूफान और तापमान के पैटर्न बदल जाते हैं। यही कारण है कि अल नीनो को वैश्विक मौसम व्यवस्था का सबसे प्रभावशाली प्राकृतिक कारकों में से एक माना जाता है।
वैज्ञानिक अनुमानों ने बढ़ाई चिंता
यूरोपीय मध्यम-अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के नवीनतम आकलनों ने जलवायु विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अनुमानों के अनुसार वर्ष के अंत तक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्री सतह का तापमान सामान्य स्तर से लगभग 3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। कुछ मॉडल तो इससे भी अधिक वृद्धि की संभावना व्यक्त कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो यह हाल के दशकों के सबसे प्रभावशाली अल नीनो घटनाक्रमों को भी पीछे छोड़ सकता है और वैश्विक तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज हो सकती है।
पुराने रिकॉर्ड टूटने की आशंका क्यों जताई जा रही है?
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 1997-98 और 2015-16 के अल नीनो घटनाक्रम अब तक सबसे शक्तिशाली माने जाते रहे हैं। उन वर्षों में दुनिया ने असामान्य गर्मी, भीषण सूखे, विनाशकारी बाढ़ और व्यापक पर्यावरणीय प्रभावों का अनुभव किया था। वर्तमान अनुमान बताते हैं कि आने वाला अल नीनो इन दोनों ऐतिहासिक घटनाओं से भी अधिक प्रभावशाली हो सकता है। कई मौसम मॉडल समुद्री तापमान में ऐसी वृद्धि दिखा रहे हैं जो पूर्व रिकॉर्डों को पार कर सकती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक समुदाय इसे केवल एक सामान्य मौसमीय घटना नहीं बल्कि संभावित वैश्विक संकट के रूप में देख रहा है।
खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
अल नीनो का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर देखने को मिलता है। अनेक देशों में वर्षा के पैटर्न बदलने से फसलों को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में लंबे सूखे की स्थिति बन सकती है। जलाशयों और नदियों के जलस्तर पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिससे पेयजल और सिंचाई संकट गहरा सकता है। इसके अतिरिक्त बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग में वृद्धि, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और आर्थिक गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ सकता है। विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और अधिक गंभीर हो सकती है, जहां बड़ी आबादी सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
2024 की रिकॉर्ड गर्मी ने पहले ही दिखा दिए संकेत
पिछला अल नीनो चरण जून 2023 से अप्रैल 2024 तक सक्रिय रहा था और उसने पहले से गर्म होती पृथ्वी के तापमान को और ऊपर पहुंचा दिया। इसी अवधि के दौरान वैश्विक तापमान ने नए रिकॉर्ड बनाए और 2024 को आधुनिक इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अगला अल नीनो अपेक्षा से अधिक शक्तिशाली हुआ तो पहले से मौजूद वैश्विक तापवृद्धि की समस्या और गंभीर रूप धारण कर सकती है। इससे चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं की गंभीर चेतावनी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में अल नीनो विकसित होने की संभावना अत्यंत प्रबल है। इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक जलवायु चक्रों का संयुक्त प्रभाव मानवता के सामने बड़ी चुनौती प्रस्तुत कर सकता है। उनका संदेश स्पष्ट है कि देशों को केवल आपदा आने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि जलवायु अनुकूलन, उत्सर्जन नियंत्रण और संसाधन प्रबंधन की दिशा में अभी से ठोस कदम उठाने होंगे।
आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है जलवायु चुनौती
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पहले से ही दीर्घकालिक वैश्विक तापवृद्धि के दौर से गुजर रही है। ऐसे में यदि अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो सक्रिय होता है तो उसका प्रभाव कई गुना अधिक महसूस किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए जलवायु जोखिमों का प्रबंधन सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल मौसम की कहानी नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य और सतत विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।