नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं। इन उपायों में प्रमुख पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का आकलन करना, लंबित प्रतिपूरक वृक्षारोपण कार्यों को पूरा करना और दो या अधिक लेन वाली पहाड़ी सड़कों तथा रेल लाइनों के निर्माण या विस्तार के लिए अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी पर विचार करना शामिल है। कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जलविद्युत परियोजनाओं, प्रतिपूरक वृक्षारोपण, सड़कों, पर्यटन और बहुमंजिला इमारतों जैसे विषयों की जांच के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। पर्यावरण और वन संबंधी रिट याचिकाओं पर अदालत को सलाह देने वाली यह कमेटी है।
पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का आकलन
कमेटी ने प्रमुख पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन करने की सिफारिश की है। हिमाचल प्रदेश में पर्यटन बढ़ने से पारिस्थितिकी पर दबाव बढ़ रहा है। बिना आकलन के पर्यटन गतिविधियां पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती हैं। वहन क्षमता तय होने से पर्यटक संख्या नियंत्रित की जा सकेगी और स्थानीय संसाधनों का संरक्षण संभव होगा। अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तर पर यह उपाय जरूरी बताया गया है। पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया गया है। स्थानीय समुदायों और प्रशासन को साथ लेकर यह कार्य करने की सलाह दी गई है।
प्रतिपूरक वृक्षारोपण पूरा करने पर जोर
कमेटी ने लंबित प्रतिपूरक वृक्षारोपण कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की सिफारिश की है। विकास परियोजनाओं के कारण कटने वाले पेड़ों की भरपाई के लिए किए जाने वाले वृक्षारोपण कई जगह अधूरे पड़े हैं। इन कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा न करने से हरियाली और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। कमेटी ने कहा कि इन कार्यों को शीघ्र पूरा किया जाए और उनकी निगरानी मजबूत की जाए। वृक्षारोपण की गुणवत्ता और जीवित रहने की दर पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई गई। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह बुनियादी कदम है।
पहाड़ी सड़कों और रेल लाइनों के लिए मंजूरी
दो या अधिक लेन वाली पहाड़ी सड़कों तथा रेल लाइनों के निर्माण या विस्तार के लिए अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी पर विचार करने की सिफारिश की गई है। पहाड़ी क्षेत्रों में बिना पर्याप्त आकलन के सड़क और रेल परियोजनाएं भूस्खलन और पर्यावरणीय नुकसान का कारण बन सकती हैं। कमेटी ने कहा कि इन परियोजनाओं से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का गहन अध्ययन जरूरी है। मंजूरी प्रक्रिया को सख्त बनाने से अनावश्यक नुकसान रोका जा सकेगा। विकास और संरक्षण दोनों को ध्यान में रखते हुए यह उपाय सुझाया गया है।
जलविद्युत परियोजनाओं और बहुमंजिला इमारतों पर नजर
कमेटी ने जलविद्युत परियोजनाओं और बहुमंजिला इमारतों के पर्यावरणीय प्रभाव की भी जांच की। हिमाचल जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में ये गतिविधियां पारिस्थितिकी को प्रभावित करती हैं। सिफारिशों में इन क्षेत्रों में सख्त नियमों और निगरानी की बात कही गई है। अवैध निर्माण और नियमों की अनदेखी पर अंकुश लगाने की जरूरत बताई गई। कमेटी की रिपोर्ट में इन सभी विषयों को जोड़कर समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया है। पर्यावरण संरक्षण को विकास नीति का अभिन्न अंग बनाने पर जोर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट का महत्व
सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की ये सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई हैं। अदालत इन पर आगे कार्रवाई तय कर सकती है। हिमाचल प्रदेश जैसे पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील राज्य के लिए ये उपाय महत्वपूर्ण हैं। पर्यटन, सड़क, रेल और जलविद्युत परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाना चुनौती भरा है। कमेटी की रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने का आधार बन सकती है। राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को इन सिफारिशों पर अमल करने की जरूरत है ताकि हिमाचल की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिकी सुरक्षित रह सके।