नई दिल्ली. मानसून की कमजोर चाल अब केवल खेतों तक सीमित चिंता नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर आने वाले महीनों में आम लोगों की रसोई पर भी दिखाई दे सकता है। देश के कई हिस्सों में जुलाई के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज होने के बाद कृषि उत्पादन और खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। खरीफ मौसम में फसलों के लिए मानसूनी बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है और लंबे समय तक वर्षा की कमी रहने पर बुआई, पौधों की बढ़वार तथा उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी खाद्य वस्तुओं के दाम निश्चित रूप से बढ़ेंगे। मानसून के अगले चरण में होने वाली बारिश, फसलों की वास्तविक स्थिति, सिंचाई की उपलब्धता, मंडियों में आवक और सरकार के आपूर्ति प्रबंधन जैसे कई कारक कीमतों की दिशा तय करेंगे। फिर भी मौसम और कृषि उत्पादन के बीच सीधे संबंध को देखते हुए कमजोर मानसून ने खाद्य महंगाई को लेकर सतर्कता जरूर बढ़ा दी है।
टमाटर और हरी सब्जियों पर सबसे पहले पड़ सकता है असर
बारिश की कमी का सबसे तेज प्रभाव आम तौर पर जल्दी खराब होने वाली सब्जियों पर दिखाई देता है। टमाटर, हरी मिर्च, पत्तेदार सब्जियां और दूसरी ताजी उपज के उत्पादन तथा मंडियों तक उनकी नियमित आपूर्ति पर मौसम का सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि पर्याप्त नमी नहीं मिलती या तापमान और वर्षा की स्थिति फसल के अनुकूल नहीं रहती, तो उत्पादन घट सकता है और मंडियों में आवक कम हो सकती है।
मांग स्थिर रहने के बावजूद जब बाजार में किसी सब्जी की आपूर्ति घटती है तो कीमतों पर तत्काल दबाव बन सकता है। यही वजह है कि मानसून की स्थिति में मामूली बदलाव भी सब्जियों के खुदरा दाम में तेज उतार-चढ़ाव पैदा कर सकता है। आने वाले कुछ सप्ताह इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस दौरान होने वाली बारिश यह तय करने में मदद करेगी कि सब्जियों की आपूर्ति सामान्य रहती है या बाजार में कमी का असर दिखाई देने लगता है।
धान और दालों की फसल पर भी मंडरा रहा खतरा
कमजोर मानसून का प्रभाव सब्जियों से कहीं व्यापक हो सकता है। खरीफ मौसम में धान और कई प्रमुख दालों की खेती पर्याप्त पानी और मिट्टी में बनी नमी पर निर्भर करती है। यदि वर्षा की कमी के कारण बुआई प्रभावित होती है या फसल के शुरुआती विकास चरण में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होता, तो उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है।
धान का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह देश के बड़े हिस्से में प्रमुख खरीफ फसल है और करोड़ों परिवारों के खाद्य उपभोग से सीधे जुड़ा है। इसी तरह अरहर, उड़द और मूंग जैसी दालों की उपलब्धता भी कृषि उत्पादन से जुड़ी है। यदि मौजूदा वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो उत्पादन संबंधी आशंकाएं आने वाले महीनों में बाजार भाव पर दबाव का रूप ले सकती हैं।
कमजोर मानसून का असर रसोई के बजट तक पहुंच सकता है
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। सब्जियां रोजमर्रा की खपत का हिस्सा हैं, जबकि दाल और चावल अधिकांश भारतीय परिवारों के भोजन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यदि इन वस्तुओं के दाम एक साथ बढ़ते हैं तो निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है।
महंगाई बढ़ने की स्थिति में परिवारों को अपने मासिक खर्च में बदलाव करना पड़ सकता है। महंगी सब्जियों की जगह अपेक्षाकृत सस्ती वस्तुओं का इस्तेमाल बढ़ सकता है और दालों या अन्य खाद्य पदार्थों की खरीद की मात्रा भी प्रभावित हो सकती है। इस तरह कृषि क्षेत्र में मौसम से शुरू हुई समस्या धीरे-धीरे उपभोक्ता बाजार और घरेलू खर्च तक पहुंच सकती है।
मानसून की अगली चाल पर टिकी किसानों की उम्मीद
किसानों के लिए मानसून की आगामी गतिविधियां इस समय सबसे महत्वपूर्ण हैं। जिन क्षेत्रों में अभी पर्याप्त बारिश नहीं हुई है, वहां अच्छी वर्षा से मिट्टी की नमी में सुधार हो सकता है और फसलों को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा जलाशयों और भूजल स्रोतों में पानी का स्तर बेहतर होने से सिंचाई पर निर्भर किसानों को भी राहत मिल सकती है।
दूसरी ओर, यदि वर्षा की कमी लगातार बनी रहती है तो किसानों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। सिंचाई के लिए अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल, डीजल या बिजली की लागत और फसल की देखभाल पर बढ़ता खर्च उत्पादन अर्थशास्त्र को प्रभावित कर सकता है। इसलिए किसान ही नहीं, बल्कि मंडियां, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और खुदरा बाजार भी मानसून की अगली चाल पर नजर बनाए हुए हैं।
खुदरा महंगाई पर भी पड़ सकता है व्यापक असर
खाद्य वस्तुओं की कीमतें देश की खुदरा महंगाई के आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सब्जियों, अनाज और दालों के दाम में तेज वृद्धि होने पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर सब्जियों जैसी अस्थिर कीमत वाली वस्तुओं में अचानक तेजी कुल खाद्य महंगाई को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, महंगाई की अंतिम तस्वीर केवल मानसून से तय नहीं होती। सरकारी भंडार, आयात-निर्यात नीति, मंडी आवक, बफर स्टॉक, ईंधन की कीमत और वैश्विक बाजार की स्थिति भी खाद्य वस्तुओं के दाम को प्रभावित करते हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है तो सरकार के सामने आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित रखने की चुनौती बढ़ सकती है।
अगस्त की बारिश तय करेगी आगे की तस्वीर
फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद मानसून के अगले चरण से जुड़ी है। यदि अगस्त में पर्याप्त और व्यापक वर्षा होती है तो खरीफ फसलों को राहत मिलने के साथ जल संसाधनों की स्थिति भी सुधर सकती है। इससे उत्पादन और भविष्य की खाद्य आपूर्ति को लेकर बनी चिंता कुछ कम हो सकती है।
लेकिन यदि बारिश क्षेत्रीय रूप से असमान रही और खेती प्रधान इलाकों में कमी जारी रही तो इसका असर धीरे-धीरे मंडियों में आवक और फिर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे सकता है। ऐसे में आने वाले सप्ताह किसानों, बाजार और उपभोक्ताओं—तीनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अभी महंगाई बढ़ने की आशंका को निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता, लेकिन कमजोर मानसून ने खाद्य कीमतों को लेकर सावधानी जरूर बढ़ा दी है।