नई दिल्ली. 1990 के सरला भट्ट हत्याकांड से जुड़े मामले में यासीन मलिक ने अदालत के समक्ष अपना बचाव नहीं करने का फैसला बताया है। उनके वकील अबू आदिल पंडित के माध्यम से श्रीनगर की अतिरिक्त जिला अदालत में 25 पन्नों का लिखित बयान दाखिल किए जाने की बात सामने आई है। मामले में अगली सुनवाई 19 सितंबर को निर्धारित बताई गई है। मलिक ने अपने बयान को अंतिम बयान बताते हुए कहा है कि परिस्थितियों पर विचार करने और इस्तखारा की नमाज अदा करने के बाद उन्होंने मुकदमे को आगे नहीं लड़ने का निर्णय लिया है। हालांकि उन्होंने साथ ही यह भी कहा है कि बचाव नहीं करने के उनके निर्णय को अपराध स्वीकार करने या अभियोजन पक्ष के आरोपों को स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह अंतर कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। किसी आरोपी का मुकदमे में अपना बचाव नहीं करने का निर्णय अपने आप में अपराध स्वीकार करना नहीं माना जाता। मलिक ने अपने बयान में राजनीतिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए यह दावा भी किया है कि उन्हें झूठा फंसाया गया है। दूसरी ओर, अदालत के सामने अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों को उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर साबित करना होगा। इसलिए उनके बयान को लेकर सामने आ रही राजनीतिक और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बावजूद मामले का अंतिम कानूनी निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही तय होगा।
कहा- मेरे लिए मृत्युदंड पर विचार किया जाए
यासीन मलिक ने अपने हलफनामे में कथित तौर पर कहा है कि वह अब मुकदमे में अपना बचाव नहीं करेंगे और उनके लिए मृत्युदंड पर विचार किया जा सकता है। उनका यह रुख उस समय सामने आया है जब वह पहले भी अदालत में इसी तरह की रणनीति अपना चुके हैं। मई 2022 में आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था। उस समय भी मलिक ने अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ कानूनी बचाव करने से इनकार किया था। इसके बाद अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े उस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी की ओर से उनकी आजीवन कारावास की सजा को मृत्युदंड में बदलने की मांग की गई है। ऐसे में सरला भट्ट हत्याकांड में मृत्युदंड की मांग वाला उनका ताजा रुख कानूनी और सुरक्षा मामलों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि मृत्युदंड जैसी सजा केवल आरोपी की मांग के आधार पर नहीं दी जा सकती। अदालत को मामले के साक्ष्यों, आरोपों, कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना होता है।
पत्नी मुशाल हुसैन मलिक से रिश्ता खत्म करने की बात
अपने कथित अंतिम बयान में यासीन मलिक ने अपने पारिवारिक जीवन को लेकर भी एक बड़ा फैसला सामने रखा है। उन्होंने पाकिस्तानी नागरिक मुशाल हुसैन मलिक के साथ अपने वैवाहिक संबंध को खत्म करने की बात कही है। दोनों ने 2009 में विवाह किया था और उनकी एक बेटी रजिया सुल्ताना है। मलिक ने अपने बयान में पत्नी से अलग होने के फैसले को निजी और भावनात्मक परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा है कि वह नहीं चाहते कि उनकी पत्नी अपने पूरे जीवन को इस स्थिति के बोझ के साथ बिताएं।
मुशाल हुसैन मलिक पाकिस्तान में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने पाकिस्तान की पिछली कार्यवाहक सरकार में मानवाधिकार और महिला सशक्तिकरण से संबंधित विशेष सलाहकार की जिम्मेदारी संभाली थी। यासीन मलिक के ताजा बयान में उनके वैवाहिक संबंधों को लेकर कही गई बातें इसलिए भी चर्चा में हैं क्योंकि यह फैसला उनके लंबे समय से जेल में रहने और परिवार से सीमित संपर्क के बीच सामने आया है। हालांकि इस वैवाहिक फैसले की कानूनी स्थिति और प्रभाव अलग विषय हैं, जिन्हें संबंधित कानून और औपचारिक प्रक्रिया के आधार पर ही समझा जा सकता है।
8 साल से परिवार से संपर्क नहीं होने का दावा
यासीन मलिक ने अपने बयान में दावा किया है कि पिछले 8 वर्षों से उन्हें अपनी पत्नी और बेटी से फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से बातचीत करने की अनुमति नहीं मिली। उन्होंने परिवार से संपर्क को लेकर प्रतिबंधों का उल्लेख करते हुए अपनी निजी परिस्थितियों को भी अपने फैसले की पृष्ठभूमि बताया है। जेल में बंद किसी व्यक्ति की परिवार से मुलाकात, फोन या अन्य संचार सुविधाएं जेल नियमों और संबंधित प्रशासनिक आदेशों के अधीन होती हैं। इसलिए मलिक द्वारा किए गए इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और उसके प्रशासनिक आधार को अलग से देखना आवश्यक है।
पत्नी के नाम लिखे गए कथित भावुक पत्र में मलिक ने कहा है कि उन्होंने यह निर्णय काफी दुख के साथ लिया है। उनका कहना है कि वह नहीं चाहते कि मुशाल उनके कारण अपना पूरा जीवन इस स्थिति के बोझ के साथ बिताएं। उन्होंने कथित तौर पर यह इच्छा भी व्यक्त की कि उनकी पत्नी गरिमा और उम्मीद के साथ अपने जीवन का नया अध्याय शुरू करें। इस हिस्से ने पूरे घटनाक्रम को कानूनी मामले से आगे एक निजी और पारिवारिक प्रसंग में भी बदल दिया है।
बेटी रजिया सुल्ताना को लेकर भी सामने आया संदेश
मलिक के बयान में उनकी बेटी रजिया सुल्ताना का भी उल्लेख है। पिता के रूप में उन्होंने बेटी के भविष्य को लेकर अपनी भावनाओं का संकेत दिया है। हालांकि सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी में यह स्पष्ट रूप से अलग-अलग रिपोर्टों में बताया जाना जरूरी है कि बेटी को लेकर उन्होंने किस प्रकार की जिम्मेदारी या संदेश सौंपा है। ऐसे संवेदनशील पारिवारिक विवरणों को बिना मूल दस्तावेज के शब्दशः तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
रजिया सुल्ताना का जीवन ऐसे परिवार में बीता है जहां उनके पिता लंबे समय से जेल में हैं और उनकी मां सार्वजनिक जीवन तथा राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। ऐसे में यासीन मलिक के कथित बयान में बेटी को लेकर व्यक्त भावनाओं का मानवीय पक्ष जरूर सामने आता है। लेकिन इस मामले में भी अदालत के समक्ष दाखिल दस्तावेज में दर्ज वास्तविक शब्दों और उनके कानूनी अर्थ को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
कौन हैं यासीन मलिक और क्यों है मामला इतना संवेदनशील
यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी राजनीति से जुड़े प्रमुख चेहरों में रहे हैं और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट से उनका संबंध रहा है। केंद्र सरकार ने इस संगठन को आतंकवाद से जुड़े आरोपों के कारण प्रतिबंधित संगठनों की सूची में रखा है। मलिक लंबे समय से सुरक्षा और आतंकवाद से संबंधित मामलों में भारतीय जांच एजेंसियों तथा अदालतों की कार्रवाई का सामना करते रहे हैं। 2022 में आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े मामले में उनकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया था।
सरला भट्ट हत्याकांड से जुड़ा मौजूदा मामला 1990 के दशक के कश्मीर के बेहद संवेदनशील दौर से संबंधित है। उस समय घाटी में आतंकवाद और हिंसा की घटनाओं ने व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव छोड़ा था। इसलिए इस मामले में किसी भी नए घटनाक्रम का असर केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहता। पीड़ित परिवार, सुरक्षा एजेंसियां, राजनीतिक पक्ष और कश्मीर के व्यापक सामाजिक संदर्भ से जुड़े लोग इस मामले को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।
अब अदालत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
यासीन मलिक की ओर से मुकदमा नहीं लड़ने और मृत्युदंड की मांग करने का कथित फैसला अपने आप में अंतिम न्यायिक परिणाम नहीं है। अदालत को यह देखना होगा कि अभियोजन पक्ष के पास क्या साक्ष्य हैं, आरोप किस कानूनी प्रावधान के तहत हैं और आरोपी के बचाव से इनकार का मामले की सुनवाई पर क्या प्रभाव पड़ता है। भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी को उचित कानूनी प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। इसलिए किसी भी गंभीर मामले में भावनात्मक या राजनीतिक निष्कर्ष से पहले न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी होता है।
मामले की अगली सुनवाई 19 सितंबर को होने की बात सामने आई है। उस सुनवाई में अदालत इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह देखती है, यह आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल मलिक के कथित हलफनामे में किए गए दावों, उनके परिवार से जुड़े फैसले और मृत्युदंड की मांग ने इस पुराने मामले को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अंतिम फैसला अदालत के हाथ में होगा और किसी भी आरोप या दावे की अंतिम कानूनी स्थिति न्यायिक आदेश से ही निर्धारित होगी।
जेल, परिवार और राजनीति के बीच एक असाधारण घटनाक्रम
यासीन मलिक का ताजा बयान इसलिए भी असाधारण है क्योंकि इसमें एक ही समय पर आपराधिक मुकदमे, मृत्युदंड की मांग, राजनीतिक आरोप और निजी पारिवारिक संबंधों से जुड़े कई पहलू सामने आए हैं। एक ओर वह अदालत के सामने अपने बचाव से पीछे हटने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अपराध स्वीकार करने से इनकार करते हुए राजनीतिक परिस्थितियों में फंसाए जाने का दावा कर रहे हैं। दूसरी ओर पत्नी से संबंध समाप्त करने और बेटी के भविष्य को लेकर व्यक्त की गई भावनाएं इस घटनाक्रम को व्यक्तिगत स्तर पर भी बेहद संवेदनशील बना रही हैं।
अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि अदालत इन दावों और कानूनी प्रक्रिया को किस रूप में आगे बढ़ाती है। मलिक की ओर से मृत्युदंड की मांग ने भले ही राजनीतिक और सार्वजनिक बहस को तेज कर दिया हो, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में सजा का निर्धारण आरोपी की इच्छा से नहीं, बल्कि कानून और न्यायिक परीक्षण के आधार पर होता है। इसलिए 19 सितंबर की प्रस्तावित सुनवाई और उसके बाद होने वाली न्यायिक कार्यवाही इस मामले की वास्तविक दिशा तय करेगी।