Ganeshotsav Ganesh Sthapana Vidhi: इस वर्ष गणेशोत्सव की शुरुआत धार्मिक दृष्टि से विशेष संयोग के बीच होने जा रही है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया से चतुर्थी तक हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी का क्रम बन रहा है। 14 सितंबर को तृतीया-युक्त चतुर्थी में हरितालिका तीज का व्रत रखा जाएगा, जबकि इसके अगले दिन पारणा होगा। इसके बाद चतुर्थी तिथि पर ब्रह्म योग के संयोग में भगवान गणेश की स्थापना की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह समय भगवान गणेश की आराधना, विघ्नों को दूर करने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष माना जाता है। गणेशोत्सव के 10 दिनों के दौरान विधि-विधान से पूजा और साधना करने से सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना की जाती है।
हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी का बन रहा विशेष क्रम
पंचांग परंपरा में चतुर्थी से युक्त तृतीया के संयोग को विशेष फलदायी माना गया है। भविष्य पुराण में हेमाद्रि के मत का उल्लेख करते हुए इस तिथि को वैदिक अनुष्ठान और पूजन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, श्रद्धा और संकल्प के साथ इस अवधि में व्रत एवं पूजा करने से सुख-शांति और आर्थिक समृद्धि की कामना की जाती है।
विवाह में अड़चन है तो गणेशोत्सव में कर सकते हैं विशेष साधना
जिन युवक-युवतियों के विवाह या अन्य मांगलिक कार्यों में बाधाएं आ रही हैं, उनके लिए गणेशोत्सव के 10 दिन विशेष साधना के अवसर के रूप में देखे जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान गणेश सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ और हवनात्मक अनुष्ठान किया जा सकता है। इसके साथ लगातार 10 दिनों तक भगवान गणेश को दूर्वा और मोदक अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता है कि इस तरह की आराधना से जीवन में आने वाले विघ्नों को दूर करने और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की जाती है।
10 दिन और गणेशजी के 10 स्वरूपों का स्मरण
गणेशोत्सव के प्रत्येक दिन भगवान गणेश के अलग-अलग स्वरूपों और नामों का स्मरण करने की परंपरा भी बताई गई है। इन 10 नामों में गणाधिप, उमापुत्र, अघनाशन, विनायक, ईशपुत्र, सर्वसिद्धिप्रदायक, एकदंत, इभवक्र, मूषकवाहन और कुमारगुरु शामिल हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रतिदिन 21 दूर्वा और मोदक अर्पित करते हुए इन नामों का स्मरण किया जा सकता है। इसे घर में सकारात्मक वातावरण और अनुकूलता के लिए शुभ माना जाता है।
दोपहर में ही क्यों की जाती है गणेश स्थापना?
धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसी वजह से गणेश चतुर्थी पर मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा के लिए मध्याह्न के शुभ समय को विशेष महत्व दिया जाता है। धर्मशास्त्रीय मान्यता में मध्याह्न का अभिजीत मुहूर्त भी गणेश स्थापना के लिए शुभ माना गया है। इस बार स्थापना के दौरान ब्रह्म योग का संयोग होने की बात कही जा रही है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस योग में की गई गणेश आराधना मनोवांछित फल की कामना के लिए विशेष मानी जाती है।
गणेश स्थापना की आसान विधि, ऐसे करें पूजा की शुरुआत
गणेश चतुर्थी के दिन घर में भगवान गणेश की स्थापना करने से पहले पूजा स्थल को साफ करके शुद्ध करें। इसके बाद विधि-विधान से पूजा शुरू की जाती है।
1. पूजा स्थान तैयार करें
घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा या पूर्व दिशा में चौकी रखें। चौकी पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।
2. गणेश प्रतिमा स्थापित करें
मिट्टी से बनी भगवान गणेश की प्रतिमा को अक्षत के पुंज पर स्थापित करें। प्रतिमा को साफ और व्यवस्थित पूजा स्थान पर रखें।
3. संकल्प लें
पूजा शुरू करने से पहले हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें।
4. पूजा सामग्री अर्पित करें
भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक, लड्डू, लाल पुष्प, सिंदूर और जनेऊ अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धा के साथ गणेश मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ करें।
मिट्टी के गणेश की प्रतिमा को क्यों माना जाता है विशेष?
धार्मिक परंपराओं में पार्थिव यानी मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। मिट्टी को पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है। वहीं, मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल विकल्प माना जाता है। इसी कारण गणेशोत्सव में मिट्टी से बनी प्रतिमा की स्थापना को धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहतर विकल्प माना जाता है।
हरितालिका तीज पर महिलाओं के लिए क्या है मान्यता?
हरितालिका तीज पर सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, धार्मिक मान्यता के अनुसार अविवाहित कन्याएं भी योग्य वर की कामना के लिए यह व्रत करती हैं। इस दिन प्रातःकाल और प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।
गणेशोत्सव में किन बातों का रखें ध्यान?
गणेश स्थापना और 10 दिवसीय उत्सव के दौरान पूजा में श्रद्धा और स्वच्छता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। पूजा सामग्री अर्पित करते समय स्थानीय परंपरा और परिवार की धार्मिक मान्यताओं का पालन किया जा सकता है। धार्मिक अनुष्ठानों के शुभ मुहूर्त में स्थानीय पंचांग और विद्वान पंडित की सलाह को प्राथमिकता देना उचित रहेगा, क्योंकि स्थान के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है।