नई दिल्ली: हर साल 9 सितंबर को हिमालय दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य हिमालयी पारिस्थितिकी, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना और इसमें जनभागीदारी बढ़ाना है। हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, नदियों, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ी जीवनरेखा है। हिमालय दिवस 2026 की थीम “ग्लोबल वार्मिंग एंड द हिमालयाज” रखी गई है। देहरादून स्थित CSIR-IIP ने भी इसी थीम के साथ हिमालय दिवस के कार्यक्रम में जलवायु परिवर्तन, कचरा प्रबंधन और हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिरता पर जोर दिया।
क्यों मनाया जाता है हिमालय दिवस?
हिमालय के महत्व और उसके संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हिमालय दिवस की शुरुआत उत्तराखंड में हुई। पर्यावरणविद् और HESCO के संस्थापक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने हिमालय के संरक्षण के लिए विशेष दिवस की पहल की थी। उत्तराखंड में इसे 9 सितंबर को मनाने की परंपरा बनी और बाद में इसका दायरा हिमालयी क्षेत्रों तक बढ़ता गया। सरकारी स्तर पर भी हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण को लगातार महत्व दिया गया है। केंद्र सरकार ने National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem (NMSHE) के तहत हिमालयी पर्यावरण से जुड़े शोध, निगरानी और संरक्षण गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।
‘हिमालय’ नाम का क्या अर्थ है?
हिमालय शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘हिम’ और ‘आलय’ से मिलकर बना है। इसका अर्थ है ‘बर्फ का घर’। हिमालय दुनिया की सबसे युवा और विशाल पर्वत प्रणालियों में से एक है। यह पश्चिम से पूर्व तक करीब 2,400 किलोमीटर तक फैला हुआ है और भारत के अलावा नेपाल, भूटान, चीन के तिब्बत क्षेत्र और पाकिस्तान तक इसका विस्तार है। भौगोलिक महत्व के साथ-साथ हिमालय का भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भी विशेष स्थान है।
हिमालय की प्रमुख पर्वत श्रेणियां
हिमालय को सामान्य तौर पर तीन प्रमुख समानांतर श्रेणियों में समझा जाता है।
1. वृहद हिमालय या हिमाद्रि
यह हिमालय की सबसे ऊंची श्रेणी है। दुनिया की कई ऊंची पर्वत चोटियां इसी क्षेत्र में स्थित हैं। माउंट एवरेस्ट, कंचनजंगा और अन्य ऊंची चोटियां हिमालयी क्षेत्र की भव्यता को दर्शाती हैं।
2. मध्य हिमालय या हिमाचल
यह श्रेणी वृहद हिमालय के दक्षिण में स्थित है। मसूरी, नैनीताल और दार्जिलिंग जैसे प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन क्षेत्र हिमालय की मध्यवर्ती पर्वतीय पट्टी से जुड़े हैं।
3. शिवालिक
शिवालिक हिमालय की सबसे बाहरी और अपेक्षाकृत नवीन पर्वत श्रेणी है। इसकी ऊंचाई अन्य प्रमुख हिमालयी श्रेणियों की तुलना में कम है।
नदियों का सबसे बड़ा स्रोत है हिमालय
हिमालय का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक योगदान उसकी जल प्रणाली है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज जैसी प्रमुख नदियों और उनकी सहायक नदियों का जल स्रोत हिमालयी ग्लेशियरों, बर्फ और वर्षा से जुड़ा है। यही वजह है कि हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर मैदानों में रहने वाली बड़ी आबादी, खेती, पेयजल, बिजली उत्पादन और उद्योगों तक पहुंच सकता है।
मानसून और जलवायु के लिए भी महत्वपूर्ण
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु को प्रभावित करने वाली प्रमुख प्राकृतिक प्रणालियों में शामिल है। पर्वत श्रृंखला मानसूनी हवाओं को रोकने और उन्हें ऊपर उठाने में भूमिका निभाती है, जिससे वर्षा की प्रक्रिया प्रभावित होती है। साथ ही, हिमालय मध्य एशिया की अत्यधिक ठंडी हवाओं के प्रभाव को भी सीमित करता है। इसलिए इसका महत्व केवल पर्वतीय राज्यों तक नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के मौसम और पर्यावरण से जुड़ा है।
हिमालय है दुर्लभ वन्यजीवों का घर
हिमालय जैव विविधता की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां हिम तेंदुआ, लाल पांडा, कस्तूरी मृग समेत कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं। तापमान में बदलाव, जंगलों में कमी, पर्यटन का दबाव और मानवीय गतिविधियों के विस्तार से इन प्रजातियों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ रहा है।
धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में हिमालय का विशेष स्थान
हिंदू धार्मिक परंपराओं में हिमालय को अत्यंत पवित्र माना गया है। भगवान शिव से जुड़ी अनेक धार्मिक मान्यताएं और तीर्थ हिमालयी क्षेत्र से जुड़े हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ और कैलाश-मानसरोवर जैसे प्रमुख तीर्थ हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाते हैं। पौराणिक परंपराओं में हिमालय को हिमवान के रूप में भी वर्णित किया गया है और देवी पार्वती को हिमवान की पुत्री माना जाता है। इसी वजह से हिमालय केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और आस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा हिमालय का खतरा
हिमालय आज जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ग्लेशियरों का पिघलना, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव, अत्यधिक बारिश, बादल फटना, भूस्खलन और ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरे लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में आई कई आपदाओं ने इस खतरे को सामने रखा है। वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ता तापमान पर्वतीय क्षेत्रों की बर्फ, ग्लेशियर और जमी हुई जमीन की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने फिर चेताया
26 अगस्त 2026 को नेपाल-चीन सीमा के पास हिमालयी क्षेत्र में हुई भयावह ग्लेशियर और चट्टान ढहने की घटना ने एक बार फिर जलवायु और पर्वतीय आपदाओं के खतरे को दुनिया के सामने ला दिया। इसके बाद तेज मलबायुक्त बाढ़ ने त्रिशुली नदी क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल में मृतकों की संख्या 1,300 से अधिक हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं। इस आपदा में जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा। विशेषज्ञों ने इस घटना को हिमालयी क्षेत्र में बदलते जलवायु और अस्थिर पर्वतीय भूभाग से जुड़े बढ़ते जोखिम की गंभीर चेतावनी माना है।
ग्लेशियर पिघले तो नदियों पर भी पड़ेगा असर
हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव का सीधा संबंध उन नदियों से है, जिन पर करोड़ों लोग निर्भर हैं। शुरुआत में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के सिकुड़ने से नदियों के जल प्रवाह और पेयजल उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। यानी हिमालय की समस्या सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं है। इसका संबंध भारत और दक्षिण एशिया की भविष्य की जल सुरक्षा से भी है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
सड़कों, पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं और शहरों का विस्तार हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अनियोजित निर्माण पर्यावरणीय जोखिम बढ़ा सकता है। उत्तराखंड में हाल के वर्षों में भी सरकार और विशेषज्ञों की ओर से इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी हिमालय को सुरक्षित रखते हुए विकास आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है।
हिमालय संरक्षण के लिए सरकार की पहल
भारत सरकार का National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem हिमालयी पर्यावरण को समझने और संरक्षित करने के लिए वैज्ञानिक शोध तथा विभिन्न कार्यक्रमों को बढ़ावा देता है। इसके अलावा IIT रुड़की समेत विभिन्न संस्थानों में भूस्खलन, मिट्टी के कटाव और जलवायु से जुड़ी आपदाओं के जोखिम को समझने तथा कम करने के लिए शोध और विशेषज्ञता विकसित की जा रही है। देहरादून स्थित Wadia Institute of Himalayan Geology भी भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियोलॉजी और हिमालयी भू-विज्ञान से जुड़े विषयों पर वैज्ञानिक अध्ययन करता है।
आम लोग हिमालय को बचाने के लिए क्या कर सकते हैं?
हिमालय का संरक्षण सिर्फ सरकार या वैज्ञानिक संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है। पर्यटक और स्थानीय लोग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
- हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक और कचरा न फैलाएं।
- स्थानीय पर्यावरण और वन्यजीवों का सम्मान करें।
- स्थानीय लोगों के होमस्टे और उत्पादों को प्राथमिकता दें।
- नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषित न करें।
- जंगलों में आग और अवैध कटाई की सूचना संबंधित विभाग को दें।
- संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण को बढ़ावा न दें।
- हिमालयी यात्रा के दौरान स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करें।
हिमालय बचाना क्यों जरूरी है?
हिमालय की रक्षा का मतलब सिर्फ पहाड़ों को बचाना नहीं है। यह नदियों, जंगलों, जैव विविधता, जलवायु, खेती, पर्यटन और करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करने से जुड़ा सवाल है हिमालय दिवस हमें याद दिलाता है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर दे, वह लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। हिमालय सुरक्षित रहेगा तो उसकी नदियां, जंगल और उनसे जुड़ी जीवन-व्यवस्था भी सुरक्षित रहेगी।