Science Desk: ज्वालामुखी विस्फोट से पहले मिलने वाली हर चेतावनी सही हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन अगर कुछ गलत अलार्म स्वीकार करने से लोगों को समय रहते सुरक्षित निकाला जा सके और जानें बचाई जा सकें, तो यह जोखिम फायदेमंद हो सकता है। न्यूजीलैंड के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी इसी निष्कर्ष की ओर इशारा करती है। हाल में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने Machine Learning आधारित ज्वालामुखी पूर्वानुमान मॉडल की उपयोगिता का विश्लेषण किया। मॉडल ने न्यूजीलैंड, जापान, चिली और रूस के पांच ज्वालामुखियों के कई वर्षों के seismic data का इस्तेमाल कर अगले 48 घंटों में विस्फोट की संभावना का आकलन किया। शोध Nature Communications में प्रकाशित हुआ है।
Whakaari हादसे ने उठाया था बड़ा सवाल
9 दिसंबर 2019 को न्यूजीलैंड के Whakaari/White Island ज्वालामुखी में अचानक विस्फोट हुआ था। उस समय द्वीप पर पर्यटक मौजूद थे और इस आपदा में 22 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। यही हादसा उन घटनाओं में शामिल है जिसने वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल खड़ा किया कि कम समय में होने वाले explosive eruptions के लिए क्या traditional monitoring से भी तेज चेतावनी प्रणाली बनाई जा सकती है। पहले के शोध में Whakaari के seismic tremor data में ऐसे precursor signals मिले थे, जिन्हें Machine Learning मॉडल घंटों पहले पहचान सकता था।
AI कैसे पहचानता है ज्वालामुखी फटने के संकेत?
ज्वालामुखी के भीतर magma, gas और hydrothermal fluids की गतिविधियों से लगातार छोटे seismic tremors पैदा होते हैं। ये बदलाव इंसानी निगरानी में तुरंत साफ नजर नहीं आते, लेकिन Machine Learning बड़े data stream में बहुत छोटे pattern changes को पहचान सकता है। Whakaari के लिए विकसित मॉडल seismic tremor के pattern का विश्लेषण कर लगातार यह अनुमान लगाता है कि अगले 48 घंटों में eruption की संभावना कितनी है। पुराने परीक्षणों में इसी तरह की प्रणाली ने कुछ विस्फोटों से कई घंटे पहले warning signal दिया था।
पांच में से चार विस्फोट पहले पकड़ लिए
नई स्टडी में Whakaari के ऐसे data पर भी मॉडल को परखा गया, जिसे training के दौरान उसने पहले नहीं देखा था। इस परीक्षण में मॉडल ने पांच में से चार eruptions को पहले पहचान लिया। लेकिन इसका नुकसान भी सामने आया। अगर इसी warning threshold को operational system में इस्तेमाल किया जाए तो औसतन साल में करीब 15 दिन ऐसे हो सकते हैं जब warning जारी हो, लेकिन eruption न हो।
False Alarm ज्यादा, फिर भी सिस्टम क्यों हो सकता है फायदेमंद?
सुनने में साल के 15 दिन false warning काफी ज्यादा लग सकती है। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि फैसला केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि alarm कितनी बार गलत निकला। असल सवाल यह है कि warning miss होने पर कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अगर गलत warning के कारण किसी tourist attraction, road या ski area को कुछ समय के लिए बंद करना पड़े तो आर्थिक नुकसान हो सकता है। लेकिन warning न मिलने की स्थिति में eruption के दौरान मौत, गंभीर चोट और infrastructure damage कहीं ज्यादा बड़ा नुकसान पैदा कर सकते हैं।
30 से 90% तक कम हो सकता है रोका जा सकने वाला नुकसान
शोधकर्ताओं ने एक cost-loss model का भी इस्तेमाल किया। इसमें precautionary action की आर्थिक लागत और समय पर warning मिलने से बचाए जा सकने वाले नुकसान की तुलना की गई। अध्ययन के अनुसार, अलग-अलग परिस्थितियों में ऐसी precautionary action से 30 से 90 प्रतिशत तक preventable losses कम किए जा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर eruption में नुकसान इतना ही कम होगा। यह अलग-अलग ज्वालामुखी, आबादी, tourism activity और evacuation cost पर निर्भर करेगा।
Mount Ruapehu जैसा मामला क्यों मुश्किल?
उदाहरण के तौर पर न्यूजीलैंड के Mount Ruapehu के आसपास बड़ी tourism और ski industry है। Busy ski season में बार-बार warning जारी होने पर resort बंद करना पड़े तो कारोबार और tourism को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ अगर वास्तविक eruption के समय warning न दी जाए, तो वहां मौजूद लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। इसलिए researchers का जोर इस balance पर है कि false alarms की cost को संभावित casualties की cost से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
ज्यादा सावधान सिस्टम कभी-कभी ज्यादा सुरक्षित
Research का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि ऐसा warning system जो कुछ ज्यादा false alarms देता है, कुछ situations में उस system से सुरक्षित हो सकता है जो केवल बेहद high-confidence situation में alert देता है।
बहुत ऊंचा threshold रखने पर false alarm कम होंगे, लेकिन वास्तविक eruption miss होने का खतरा बढ़ सकता है।
इसके उलट थोड़ा lower threshold लोगों को अधिक बार alert करेगा, लेकिन dangerous eruption miss होने की संभावना कम हो सकती है। यही safety-versus-disruption trade-off इस study का मुख्य विषय है।
AI वैज्ञानिकों की जगह नहीं लेगा
Research में automatic warning systems को volcanologists का replacement नहीं माना गया है। इनका काम real-time monitoring data में अचानक होने वाले बदलाव को तेजी से पकड़कर शुरुआती संकेत देना होगा। इसके बाद विशेषज्ञ seismic data, gas emission, deformation और दूसरी monitoring information का विश्लेषण कर स्थिति का विस्तृत assessment कर सकते हैं। University of Canterbury के पहले के Whakaari project में भी automated system को volcanologists की decision-making में मदद करने वाले tool के रूप में पेश किया गया था।
2019 के विस्फोट में मिल सकता था कई घंटे का संकेत
Whakaari पर पहले किए गए Machine Learning research में 2019 के घातक eruption से पहले warning देने की क्षमता दिखाई गई थी।
एक pseudoprospective test में model ने 2019 eruption से काफी पहले elevated risk detect किया था और strongest signal eruption से कुछ घंटे पहले दिखाई दिया था। हालांकि यह historical data पर किया गया परीक्षण था, इसलिए इसे वास्तविक समय में दी गई official warning नहीं माना जा सकता।
UN की Early Warnings for All मुहिम से भी जुड़ता है मुद्दा
यह research broader disaster-warning debate से भी मेल खाती है। संयुक्त राष्ट्र की Early Warnings for All initiative का लक्ष्य 2027 के अंत तक दुनिया के हर व्यक्ति को life-saving early warning systems की पहुंच में लाना है। UN का कहना है कि effective early warning systems लोगों को evacuation और preparedness के लिए समय देकर जान-माल का नुकसान कम कर सकते हैं।
पूरी certainty का इंतजार भी बन सकता है खतरा
अचानक होने वाले volcanic eruptions की सबसे बड़ी समस्या यही है कि कई बार warning window बहुत छोटी होती है।
अगर authorities केवल तब alert दें जब eruption लगभग निश्चित हो जाए, तो evacuation के लिए पर्याप्त समय नहीं बच सकता। नई study का संदेश यही है कि कुछ high-risk environments में false alarm पूरी तरह खत्म करने की कोशिश से ज्यादा जरूरी वास्तविक eruption miss न करना हो सकता है। लेकिन इसके लिए warning communication ऐसा होना चाहिए कि बार-बार alert के बावजूद जनता का भरोसा खत्म न हो।