कोलकाता: भारतीय थाली में सलाद का अहम हिस्सा माना जाने वाला खीरा अब पश्चिम बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था की पहचान बन गया है। नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल खीरा उत्पादन के मामले में पूरे देश में प्रथम स्थान पर पहुँच गया है। देश के कुल खीरा उत्पादन का 20 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा अकेले बंगाल से आ रहा है।
आंकड़ों में बंगाल की बादशाहत
भारत में लगभग 1,38,000 हेक्टेयर भूमि पर खीरे की खेती की जाती है, जिससे सालाना 20 लाख टन से अधिक उत्पादन होता है। इस सूची में पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है, जबकि इसके बाद हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का नंबर आता है।
क्यों आगे है पश्चिम बंगाल?
विशेषज्ञों के अनुसार, बंगाल की इस सफलता के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
1. उपजाऊ मिट्टी: गंगा के मैदानी इलाकों की जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) खीरे की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
2. अनुकूल जलवायु: बंगाल की गर्म और आर्द्र जलवायु खीरे की फसल के लिए बेहद मददगार है, जिससे यहाँ साल भर पैदावार संभव होती है।
3. आधुनिक तकनीक: राज्य के किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ 'ग्रीनहाउस तकनीक' का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे कम जगह में अधिक और बेहतर गुणवत्ता वाला उत्पादन हो रहा है।
साल भर होती है कमाई
पश्चिम बंगाल में मुख्य रूप से दो सीजन में खीरा उगाया जाता है। पहला खरीफ (जून से अक्टूबर) और दूसरा जायद (फरवरी से मई)। दो अलग-अलग सीजन होने के कारण बाजार में खीरे की आपूर्ति निरंतर बनी रहती है, जिससे किसानों को स्थिर आय प्राप्त होती है।
निर्यात के मोर्चे पर भी मजबूत
भारत न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि पश्चिम एशिया (Middle East) के देशों में बड़े पैमाने पर खीरे का निर्यात भी कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग के कारण अब यह खेती किसानों के लिए एक मुनाफे वाला व्यवसाय बन चुकी है। प्राकृतिक संसाधनों और किसानों की कड़ी मेहनत ने आज पश्चिम बंगाल को भारत का 'खीरा भंडार' बना दिया है।