नई दिल्ली - आज के डिजिटल दौर में ऑनलाइन पेमेंट का चलन भले ही बढ़ गया हो, लेकिन कारोबार, उधार, प्रॉपर्टी और दूसरे बड़े लेन-देन में चेक का इस्तेमाल अब भी होता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को भुगतान के बदले मिला चेक बैंक से बाउंस हो जाए, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि कानूनी कार्रवाई कब तक करनी होगी? क्या चेक बाउंस होने के एक साल बाद भी कोर्ट में मामला दर्ज कराया जा सकता है? चेक बाउंस से जुड़े मामलों में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 अहम भूमिका निभाती है। हालांकि, इसमें अलग-अलग चरणों के लिए अलग समयसीमा निर्धारित है।

चेक बाउंस होने पर सबसे पहले क्या करना होता है?
जब बैंक किसी चेक को पर्याप्त धनराशि न होने या कानून में बताए गए किसी अन्य आधार पर वापस कर देता है, तो चेक पाने वाले व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करनी होती है। धारा 138 के तहत बैंक से चेक लौटने की जानकारी मिलने के बाद 30 दिनों के भीतर चेक जारी करने वाले व्यक्ति को लिखित डिमांड नोटिस भेजना होता है। इस नोटिस में बकाया रकम का भुगतान करने की मांग की जाती है।
नोटिस मिलने के बाद मिलते हैं 15 दिन
नोटिस भेजने के बाद मामला तुरंत आपराधिक शिकायत तक नहीं पहुंचता। चेक जारी करने वाले व्यक्ति को नोटिस प्राप्त होने के बाद 15 दिनों का समय दिया जाता है, ताकि वह चेक की रकम का भुगतान कर सके। अगर इस अवधि के भीतर भुगतान कर दिया जाता है, तो धारा 138 के तहत आपराधिक कार्रवाई की स्थिति आम तौर पर नहीं बनती।
15 दिन में भुगतान नहीं हुआ तो क्या होगा?
अगर नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर चेक की रकम का भुगतान नहीं किया जाता है, तो धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराने का आधार बन सकता है। इसके बाद शिकायतकर्ता संबंधित अदालत में चेक बाउंस का मामला दायर कर सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—30 दिन की अवधि नोटिस भेजने के लिए है, जबकि कोर्ट में शिकायत दाखिल करने की समयसीमा नोटिस की 15 दिन की भुगतान अवधि खत्म होने के बाद शुरू होती है।
क्या एक साल बाद भी केस किया जा सकता है?
सामान्य नियम के तहत धारा 138 की शिकायत कार्रवाई के कारण (cause of action) पैदा होने के बाद एक महीने के भीतर दाखिल की जानी चाहिए। इसलिए केवल यह सोच लेना सही नहीं होगा कि चेक बाउंस होने के एक साल बाद कभी भी सामान्य तौर पर शिकायत दाखिल की जा सकती है। हालांकि, कानून में देरी को कुछ परिस्थितियों में माफ किए जाने का प्रावधान भी है। यदि शिकायतकर्ता निर्धारित अवधि में अदालत का रुख नहीं कर पाया और देरी के लिए उचित कारण मौजूद है, तो अदालत देरी को माफ करने पर विचार कर सकती है। इसलिए एक साल बाद मामला दाखिल करना अपने आप में सामान्य समयसीमा के भीतर नहीं माना जाएगा और ऐसी स्थिति में देरी की कानूनी वजह महत्वपूर्ण हो सकती है।
चेक बाउंस मामले की आसान टाइमलाइन
चेक बैंक में जमा → चेक बाउंस → बैंक से सूचना → 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस → नोटिस मिलने के बाद 15 दिन का भुगतान समय → भुगतान न होने पर कार्रवाई का कारण → निर्धारित अवधि में कोर्ट में शिकायत। इसलिए चेक बाउंस होने पर सिर्फ 30 दिनों की अवधि याद रखना पर्याप्त नहीं है। नोटिस भेजने और अदालत में शिकायत दाखिल करने की समयसीमा अलग-अलग होती है। किसी विशेष मामले में चेक की वापसी की तारीख, नोटिस की तारीख, नोटिस मिलने की तारीख और भुगतान की स्थिति के आधार पर समयसीमा बदल सकती है। इसलिए वास्तविक मामले में दस्तावेजों के साथ कानूनी सलाह लेना उचित रहता है।