भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन करती रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आगामी वित्त वर्ष के लिए कुछ महत्वपूर्ण जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। संस्था का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और मानसूनी परिस्थितियों में संभावित कमजोरी देश की आर्थिक गति को प्रभावित कर सकती है। वैश्विक आर्थिक वातावरण पहले से ही अनिश्चित बना हुआ है और ऐसे समय में ऊर्जा बाजार तथा कृषि उत्पादन से जुड़े जोखिम भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए विशेष महत्व रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों मोर्चों पर संतुलित नीतिगत हस्तक्षेप आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बढ़ सकती हैं आर्थिक चुनौतिया
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के भारत और भूटान के वरिष्ठ रेजिडेंट प्रतिनिधि अनिल साल्गाडो के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव यदि और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग अस्सी प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाला प्रत्येक बड़ा उतार-चढ़ाव सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात व्यय बढ़ सकता है, चालू खाते के संतुलन पर दबाव आ सकता है और परिवहन तथा उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण महंगाई पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे उद्योग, व्यापार और आम उपभोक्ता सभी प्रभावित हो सकते हैं।
मानसून की अनिश्चितता से कृषि और महंगाई पर मंडरा रहा खतरा
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कमजोर मानसून को भारत के लिए दूसरा बड़ा जोखिम बताया है। संस्था के अनुसार अल-नीनो की संभावित परिस्थितियों के कारण वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका बनी हुई है। यद्यपि जुलाई के दौरान मानसूनी गतिविधियों में कुछ सुधार देखने को मिला है, फिर भी पूरे मौसम की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखने की आवश्यकता है। भारत की बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है और कृषि उत्पादन का सीधा संबंध खाद्य महंगाई तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। यदि वर्षा अपेक्षा से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और समग्र महंगाई पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न होने की आशंका रहेगी।
विकास दर के अनुमान में संशोधन, फिर भी दीर्घकालिक भरोसा बरकरार
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि संस्था ने इसके अगले वित्त वर्ष के लिए वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं को लेकर उसका भरोसा अभी भी कायम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनी रहती है और मानसून सामान्य रहता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पुनः तेज विकास की दिशा में आगे बढ़ सकती है। घरेलू मांग, बुनियादी ढांचा निवेश और विनिर्माण क्षेत्र की मजबूती भविष्य की आर्थिक वृद्धि के महत्वपूर्ण आधार बने रहेंगे।
सांख्यिकीय सुधारों से बढ़ेगी आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत के राष्ट्रीय आय आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन संशोधित आधार वर्ष 2022-23 के अनुरूप वर्ष 2026 के अंत तक किया जाएगा। संस्था ने माना है कि भारत ने अपनी सांख्यिकीय प्रणाली को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार लागू किए हैं। सकल घरेलू उत्पाद के आधार वर्ष में परिवर्तन, वस्तु-स्तरीय मूल्य सूचकांकों के दायरे का विस्तार, विनिर्माण क्षेत्र में डबल डिफ्लेशन पद्धति का उपयोग तथा प्रशासनिक एवं डिजिटल आंकड़ों का व्यापक समावेश ऐसे कदम हैं, जिनसे आर्थिक आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक और भरोसेमंद आंकड़े प्रभावी आर्थिक नीति निर्माण तथा निवेशकों के विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।