भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee-MPC) की तीन दिवसीय बैठक सोमवार से शुरू हो गई है। इस बैठक के दौरान ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का विस्तृत आकलन किया जाएगा। बैठक के बाद 5 अगस्त को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा समिति के निर्णयों की घोषणा करेंगे। उद्योग जगत, बैंकिंग क्षेत्र, निवेशकों और आम उपभोक्ताओं की नजर इस फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि रेपो दर में किसी भी बदलाव का सीधा असर होम लोन, वाहन ऋण, कॉरपोरेट फंडिंग और निवेश पर पड़ता है।
रेपो दर में बदलाव की संभावना कम क्यों?
अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार आरबीआई नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रख सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बनी आर्थिक अनिश्चितता और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि और वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को देखते हुए केंद्रीय बैंक फिलहाल सतर्क रुख अपनाना चाह सकता है। ऐसे में ब्याज दरों में बदलाव करने के बजाय मौजूदा नीति को बनाए रखना अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है।
महंगाई के जोखिम अब भी बने हुए हैं
आरबीआई ने अपनी पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया था। केंद्रीय बैंक का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर पेट्रोल, डीजल और परिवहन लागत के माध्यम से घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बना रह सकता है। यही कारण है कि महंगाई को नियंत्रित रखना फिलहाल आरबीआई की प्राथमिकताओं में शामिल है।
आर्थिक वृद्धि के अनुमान में भी किया गया संशोधन
महंगाई के साथ-साथ आरबीआई ने आर्थिक वृद्धि के अनुमान में भी संशोधन किया है। केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर का अनुमान अप्रैल में जारी 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया था। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन वैश्विक व्यापार, निर्यात, निवेश और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण विकास दर पर कुछ दबाव बना हुआ है।
लोन लेने वालों और निवेशकों पर क्या होगा असर?
यदि आरबीआई रेपो दर में कोई बदलाव नहीं करता है तो फिलहाल बैंकों की उधार दरों में भी तत्काल परिवर्तन की संभावना कम रहेगी। इसका अर्थ है कि होम लोन, ऑटो लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले ऋणों की मासिक किस्तों (EMI) में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। वहीं, बैंक जमा (FD) पर मिलने वाले ब्याज और कॉरपोरेट ऋण लागत भी मौजूदा स्तर पर बनी रह सकती है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिर ब्याज दरें निवेशकों और उद्योगों के लिए नीति संबंधी स्पष्टता बनाए रखने में मदद करेंगी।
5 अगस्त को आएगा अंतिम फैसला
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 अगस्त को द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा के फैसलों की घोषणा करेंगे। इस दौरान केवल रेपो दर ही नहीं, बल्कि महंगाई, आर्थिक वृद्धि, तरलता प्रबंधन, वैश्विक आर्थिक स्थिति और भविष्य की मौद्रिक नीति के संकेतों पर भी विस्तृत जानकारी दी जाएगी। निवेशक, उद्योग जगत और वित्तीय बाजार इस घोषणा से आगे की आर्थिक दिशा का अनुमान लगाने की कोशिश करेंगे।