मध्यप्रदेश का देश के स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान रहा है। साहसी युवाओं ने जन-चेतना कार्य जारी रखा था। मध्यप्रदेश की धरती पर ही महाराजा छत्रसाल जैसे वीर शासक हुए जिन्होंने बाहरी हमलावरों को चने चबाने पर मजबूर किया। मध्यप्रदेश की धरती पर ही चंद्रशेखर आजाद ने जन्म लिया था। वर्तमान आलीराजपुर जिले के भाबरा में जन्में आजाद की कर्मस्थली पूरा देश थी। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव , आलीराजपुर में अमर शहीद आजाद को नमन कर योगदान को स्मरण किया चंद्रशेखर आजाद जन्म से ही देशभक्त थे। बाल्यकाल से ब्रिटिश सत्ता के प्रति उनके मन में घृणा और आक्रोश का भाव था। उनका जीवन ब्रिटिश सत्ताइयों से संघर्ष में ही बीता।
अपने क्रांतिकारी साथियों के बीच आजाद की लोकप्रियता अनूठी थी। वे कभी कमजोर नहीं पड़े। बुंदेलखण्ड में आजाद के जीवन के कई वर्ष बीते। ओरछा को उन्होंने केन्द्र बनाकर स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास निरंतर जारी रखे।ओरछा की आजाद कुटी में जाकर एक ऊर्जा सी मिलती है।
आजाद नगर में आजाद की प्रतिमाएं और उद्यान
आजाद नगर में भी शहीद आजाद की कुटिया को नया स्वरूप देने का कार्य किया गया। यहां वर्ष 2011-12 में आजाद स्मृति मंदिर बनकर तैयार हुआ। सात फीट ऊंची अष्ट धातु की आजाद प्रतिमा स्थापित की गई । इसी तरह आजाद मैदान में 14 फीट की प्रतिमा स्थापित है । यही नहीं करीब 5 हेक्टेयर क्षेत्र में आजाद स्मृति उपवन का विकास भी किया गया है।
भाबरा अर्थात आजाद नगर के आजाद स्मृति मंदिर के उन्नयन के साथ ही उद्यान के विकास की सार्थक पहल की गई है। पहली बार कोई प्रधानमंत्री भी यहां पहुंचे। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश के आजाद नगर पहुंचे थे और इस महान शहीद के प्रति सम्मान प्रकट किया।
23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद अपने जीवन की अंतिम बेला अर्थात 27 फरवरी 1931 तक साहस,प्रबल आत्म विश्वास, दृढ इच्छा शक्ति, अभूतपूर्व राष्ट्रप्रेम और फिरंगियों के प्रति आम जनता की भावनाओं को अभिव्यक्त देने का सशक्त माध्यम रहे। उन्होंने नेतृत्व भी किया और हजारों-हजार नौजवान साथियों को शौर्य, संघर्ष के लिये प्रेरित भी किया। काशी की संस्कृत विद्यापीठ में अध्ययन की शौर्य संघर्ष के लिये प्रेरित भी किया। काशी की संस्कृत विद्यापीठ में अध्ययन की मंशा से वे 15 वर्ष की उम्र में ही अपने फूफाजी के पास बनारस पहुंच गए थे। अंग्रेज अफसरों द्वारा पीठ पर बैंत मारे जान के बाद भी चंद्रशेखर आजाद ने उफ नहीं की। छोटी आयु से ही राष्ट्रीय आंदोलनों में हिस्सेदारी का उन्हें जुनून था। आजाद को विशेष रूप से वर्ष 1925 के काकोरी केस के लिये याद किया जाता है। इस कांड के नायक और रणनीतिकार चंद्रशेखर आजाद थे। सहारनपुर-लखनऊ ट्रेन को काकोरी के पास रोककर क्रांतिकारियों ने खजाना लूटा था। काकोरी केस एक संदेश था फिरंगी सरकार को, कि आप भारत के स्वतंत्रता प्रेमी युवाओं की ताकत को अनदेखा नहीं कर सकते। हकीकत में अंग्रेज इस केस के बाद तिलमिला गए थे। यह मां जगरानी देवी और पिता सीताराम तिवारी से प्राप्त संस्कार ही थे जिसकी वजह से चंद्रशेखर आजाद ने सदैव अपने मनोबल को बनाए रखकर देश के हित को सर्वोपरि माना।
आज की युवा पीढ़ी शक्ति वर्धक दूध की जगह सॉफ्ट ड्रिंक्स, मदिरा और हुक्का पीने लगी है। काश,आजाद के जीवन से यही एक बात सीख लें,नियमित दूध का सेवन,तो काफ़ी बलशाली पीढ़ी तैयार हो जायेगी। इम्यूनिटी बनाए रखने का नारा बहुत चल रहा आजकल।आजाद तो उस दौर में पर्सनल इम्यूनिटी के महत्व को न सिर्फ समझते थे,बल्कि इसके एंबेसडर बनकर लाखों,करोड़ों नौजवानों को इसका संदेश भी दिया।
विपत्तियों से घबराए बिना आजाद लगातार जूझते रहे।
चाहे राम राजा की नगरी ओरछा में ब्रम्हचारी, सन्यासी बनकर रहने का दौर हो अथवा बनारस में क्रांतिकारी मित्रों के साथ राष्ट्र को आजाद कराने के लिए की गई कोशिशें ,ये चंद्रशेखर आजाद ही थे जो पूरी फौज से अकेले भिड़ जाने की कुव्वत रखते थे । वो 27 फरवरी 1931 का दिन था। आजाद को ब्रिटिश पुलिस दल ने चारों ओर से घेर लिया था । इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में दाखिल होते आजाद के पास तेज रफतार से दौड़ती एक कार अचानक रुकी, सीआईडी अधीक्षक, नॉट बॉबर दो सिपाहियों के साथ उतरा । उसने आजाद पर फायर भी किया । घायल स्थिति में आजाद भी अपने पिस्तौल से फायरिंग करते रहे। इस बीच वहां अतिरिक्त पुलिस भी आ गई । आजाद विवश हो गए थे । उनकी पिस्तौल में एक ही गोली शेष थी । दो तरफा संघर्ष की स्थिति अब समाप्त हो गई थी। आजाद का मन बहुत व्याकुल था ।
अंग्रेजों को आजाद को खत्म करने का अवसर नहीं मिला । मध्यप्रदेश की माटी के इस अदम्य वीर ने खुद कनपटी पर आखिरी बची गोली दाग दी और भारतमाता की जय-जयकार करते हुए इहलीला समाप्त की। वास्तव में ये बिलकुल सच है कि उस दौर में "आजाद " हुए इसलिए हम आज आजाद हैं।
नई पीढ़ी जब आजाद के साहस की कथाएं पढ़ेगी तो स्वतंत्रता कायम रखने की कीमत भी जान सकेगी।अभी तो आजाद पाठ्य पुस्तकों में पढ़े और पढ़ाए जा रहे,काश उनके जीवन को सिर्फ पढ़कर भुला देने के स्थान पर उनके जज्बे को समझने की कोशिश हो।
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