दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी प्रगति ने देश के अनेक हिस्सों में वर्षा की कमी को लेकर गंभीर आशंकाएं पैदा कर दी हैं। सामान्य परिस्थितियों में जून के तीसरे सप्ताह तक मानसून देश के अधिकांश भूभाग को आच्छादित कर लेता है, किंतु इस बार इसकी गति अपेक्षाकृत धीमी रहने से वर्षा का वितरण प्रभावित हुआ है। परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और प्रारंभिक कृषि गतिविधियां प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर करोड़ों किसानों के लिए यह स्थिति केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि उनकी आय, उत्पादन और आजीविका से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुकी है। यदि मानसून की यह सुस्ती लंबे समय तक बनी रहती है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देना स्वाभाविक होगा।
अलनीनो का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं
संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था ने पहले ही संकेत दिया है कि अलनीनो का प्रभाव भारत सहित एशिया के अनेक देशों की कृषि व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। भारत, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया तथा तिमोर-लेस्ते जैसे देशों में वर्षा आधारित खेती पर इसका विशेष असर पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है। विशेष रूप से धान और मक्का जैसी फसलें वर्षा पर अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए कम वर्षा या असंतुलित वर्षा उनके उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इससे न केवल खाद्यान्न उत्पादन में कमी आएगी बल्कि वैश्विक खाद्य बाजार, कृषि व्यापार और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है। ऐसे परिदृश्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
वर्षा की असमानता बन रही सबसे बड़ी चुनौती
अलनीनो की सबसे गंभीर विशेषता यह है कि यह केवल कुल वर्षा की मात्रा को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि वर्षा के समय और भौगोलिक वितरण को भी असंतुलित कर देता है। कई बार कुल वर्षा सामान्य के आसपास रहती है, किंतु उसका अधिकांश भाग सीमित अवधि अथवा कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में केंद्रित हो जाता है। इससे बुआई, अंकुरण और फसलों की शुरुआती वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। देश के अनेक कृषि क्षेत्र आज भी पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं से वंचित हैं और वहां खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। तेलंगाना, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामान्य से कम वर्षा की स्थिति इस चुनौती को और गंभीर बना रही है। इसलिए भविष्य में केवल औसत वर्षा का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके वैज्ञानिक वितरण पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।
जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव
मानसून की सुस्ती का प्रभाव जलाशयों में उपलब्ध जल पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता की तुलना में काफी कम स्तर पर बना हुआ है। यदि वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए जल उपलब्धता पर गंभीर दबाव उत्पन्न हो सकता है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, ग्रामीण रोजगार, पशुपालन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। भारतीय रिजर्व बैंक भी यह संकेत दे चुका है कि कमजोर मानसून मुद्रास्फीति, उपभोक्ता मांग और समग्र आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आय घटने से छोटे ऋण देने वाले वित्तीय संस्थानों की ऋण वसूली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सरकारी तैयारी के साथ दीर्घकालीन रणनीति की आवश्यकता
सरकार ने संभावित परिस्थितियों को देखते हुए राज्यों को स्थानीय जलवायु के अनुरूप फसल योजनाएं तैयार करने, कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों को बढ़ावा देने तथा किसानों तक समय पर वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने के निर्देश दिए हैं। इसके अतिरिक्त दलहन का पर्याप्त रणनीतिक भंडार तैयार रखकर संभावित आपूर्ति संकट से निपटने की भी तैयारी की गई है। यह स्वागतयोग्य पहल अवश्य है, किंतु केवल आपातकालीन उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, जलाशयों के पुनर्जीवन, जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों, मौसम आधारित पूर्वानुमान प्रणाली तथा कृषि अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। इसके साथ ही किसानों को समय पर बीज, तकनीकी परामर्श और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में नीति निर्माण की नई दिशा
अलनीनो अब केवल एक मौसमी घटना नहीं रह गया है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों के बीच यह कृषि और आर्थिक स्थिरता की परीक्षा बनता जा रहा है। बदलते मौसम चक्र यह संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां अधिक बार उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए अल्पकालिक राहत योजनाओं के साथ-साथ दीर्घकालीन राष्ट्रीय रणनीति तैयार करना समय की अनिवार्यता है। जल प्रबंधन, कृषि विविधीकरण, वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल मौसम सेवाओं और ग्रामीण आधारभूत संरचना में निवेश को बढ़ाकर ही देश इस चुनौती का प्रभावी सामना कर सकता है। यदि नीति निर्माण में दूरदृष्टि, प्रशासनिक संवेदनशीलता और समयबद्ध क्रियान्वयन को प्राथमिकता दी जाए तो भारत न केवल अलनीनो जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकेगा, बल्कि भविष्य की खाद्य और जल सुरक्षा भी अधिक मजबूत आधार पर सुनिश्चित कर पाएगा।