वैश्विक स्तर पर निवेश और व्यापारिक विवादों के समाधान में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे मामलों में किसी भी देश या पक्ष द्वारा जिस व्यक्ति को मध्यस्थ नियुक्त किया जाता है, उसकी निष्पक्षता, कानूनी विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ की रूस की ओर से नियुक्ति को उल्लेखनीय माना जा रहा है।
यह नियुक्ति केवल किसी एक कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्यायिक विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता का भी संकेत देती है। अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में अनुभवी और व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले विधि विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की नियुक्ति इसी विश्वास का प्रतीक मानी जा रही है।
क्या है रूस और ओशाडबैंक के बीच विवाद?
वर्तमान मामला यूक्रेन के सरकारी बैंक ओशाडबैंक और रूस के बीच निवेश संधि से जुड़े दावों का है। ओशाडबैंक का आरोप है कि वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के विस्तार के बाद डोनेट्स्क, लुहान्स्क, खेरसॉन और जापोरिजिया क्षेत्रों में स्थित उसकी परिसंपत्तियों और व्यावसायिक गतिविधियों को भारी क्षति पहुंची। बैंक का कहना है कि इन परिस्थितियों के कारण उसे बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा, जिसके लिए वह अंतरराष्ट्रीय निवेश संधि के तहत मुआवजे की मांग कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय निवेश संधियां विदेशी निवेशकों को कुछ कानूनी संरक्षण प्रदान करती हैं। यदि किसी निवेशक को यह लगता है कि उसकी संपत्ति या निवेश को अनुचित रूप से नुकसान पहुंचाया गया है, तो वह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के माध्यम से दावा प्रस्तुत कर सकता है। ओशाडबैंक ने भी इसी कानूनी व्यवस्था का सहारा लिया है और विवाद अब तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण के समक्ष सुना जाएगा।
तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण करेगा मामले की सुनवाई
इस मामले के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण में तीन सदस्य शामिल हैं। रूस ने अपनी ओर से न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया है, जबकि ओशाडबैंक की ओर से प्रख्यात विधि विशेषज्ञ स्टावरोस ब्रेकौलाकिस को नामित किया गया है। न्यायाधिकरण की अध्यक्षता ड्याला जिमेनेज करेंगी, जो अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के क्षेत्र में अनुभवी विशेषज्ञ मानी जाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया में प्रत्येक पक्ष सामान्यतः एक-एक मध्यस्थ नियुक्त करता है, जबकि तीसरे सदस्य की भूमिका न्यायाधिकरण की अध्यक्ष के रूप में निष्पक्ष संचालन सुनिश्चित करने की होती है। इस प्रकार का ढांचा विवाद के संतुलित और विधिसम्मत निस्तारण के लिए वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
पहले भी रूस कर चुका था संपर्क
इस नियुक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ इससे पहले भी रूस से जुड़े मध्यस्थता मामलों में प्रस्ताव प्राप्त कर चुके हैं। वर्ष 2025 में उन्हें रूस के विरुद्ध विंटरशाल डीया से जुड़े निवेश विवाद में नियुक्ति प्राधिकारी की भूमिका सौंपी गई थी। उस प्रक्रिया में उनकी जिम्मेदारी न्यायाधिकरण के गठन से संबंधित प्रक्रियात्मक मामलों तक सीमित थी।
बाद में रूस की ओर से उन्हें एक अन्य मामले में मध्यस्थ बनने का प्रस्ताव भी दिया गया था, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। अब ओशाडबैंक विवाद में रूस द्वारा उनकी नियुक्ति यह दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी समुदाय में उनकी निष्पक्षता और विशेषज्ञता को उच्च स्तर पर स्वीकार किया जाता है। यह नियुक्ति किसी राजनीतिक समर्थन का नहीं, बल्कि कानूनी योग्यता और पेशेवर विश्वसनीयता का संकेत मानी जाती है।
युद्ध के बाद बढ़े निवेश विवाद
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने केवल भू-राजनीतिक स्थिति को ही नहीं बदला, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून के क्षेत्र में भी अनेक जटिल विवाद उत्पन्न किए हैं। युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत अनेक यूक्रेनी कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और निवेशकों ने अपनी परिसंपत्तियों को हुए नुकसान के लिए रूस के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रियाएं शुरू की हैं।
ओशाडबैंक का मामला भी इन्हीं विवादों की श्रृंखला का हिस्सा है। इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों ने कुछ मामलों में यूक्रेनी निवेशकों के पक्ष में निर्णय देते हुए रूस को निवेश संधियों के उल्लंघन का जिम्मेदार ठहराया है और मुआवजा देने के आदेश भी पारित किए हैं। हालांकि ऐसे निर्णयों को लागू कराना अंतरराष्ट्रीय कानून में अलग और जटिल प्रक्रिया होती है।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की वैश्विक कानूनी पहचान
न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ का कार्यकाल भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में नवंबर 2024 में समाप्त हुआ था। अपने न्यायिक कार्यकाल के दौरान उन्होंने संवैधानिक अधिकारों, निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल अधिकारों और संस्थागत सुधारों से जुड़े अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे अंतरराष्ट्रीय कानून, निवेश मध्यस्थता और वैश्विक विधिक विमर्श से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
जून 2026 में उन्होंने लंदन इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स वीक के दौरान भारत में निवेश संधि मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन की बदलती भूमिका पर विस्तार से अपने विचार रखे थे। अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून के क्षेत्र में उनकी सक्रियता और विशेषज्ञता को देखते हुए यह नई जिम्मेदारी उनके वैश्विक विधिक योगदान का स्वाभाविक विस्तार मानी जा रही है।