ब्रिक्स के आगामी शिखर सम्मेलन में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को लेकर भारत की एक महत्वपूर्ण पहल चर्चा के केंद्र में आ सकती है। दक्षिण अफ्रीकी समाचार माध्यम में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, भारत ने ब्रिक्स देशों की घरेलू भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने के लिए एक डिजिटल सेतु विकसित करने का विचार सामने रखा है। प्रस्ताव का मूल उद्देश्य यह है कि सदस्य देशों के बीच व्यापार और वित्तीय लेनदेन के लिए हर बार अमेरिकी डॉलर को मध्यस्थ मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करने की आवश्यकता न रहे। यह पहल ऐसे समय में सामने आ रही है जब वैश्विक व्यापार में मुद्रा जोखिम, प्रतिबंधों और भुगतान व्यवस्था की निर्भरता को लेकर कई देशों में बहस तेज है।
भारत की पहल को हालांकि डॉलर के खिलाफ किसी तत्काल अभियान के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका संभावित लक्ष्य भुगतान के विकल्पों का विस्तार करना और ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन की हिस्सेदारी बढ़ाना है। भारत लंबे समय से डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में अपनी घरेलू क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में यदि अलग-अलग देशों की तेज भुगतान प्रणालियों को किसी साझा तकनीकी ढांचे के माध्यम से जोड़ा जाता है, तो सीमा-पार भुगतान की लागत और समय दोनों को कम करने की संभावना बन सकती है।
डॉलर को हटाना नहीं, निर्भरता के विकल्प बढ़ाना मकसद
इस प्रस्ताव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाने की योजना से अलग समझना होगा। ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाओं, मौद्रिक नीतियों, पूंजी बाजारों और मुद्रा व्यवस्थाओं में काफी अंतर है। इसलिए सभी देशों को एक ही नई मुद्रा अपनाने के लिए तैयार करना बेहद जटिल प्रक्रिया होगी। इसके मुकाबले स्थानीय मुद्राओं में सीधे भुगतान के लिए तकनीकी और वित्तीय ढांचा तैयार करना अपेक्षाकृत व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। इस व्यवस्था में भारतीय रुपये, चीनी युआन, रूसी रूबल, ब्राजीलियाई रियाल या अन्य सदस्य देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं का उपयोग बना रहेगा।
मूल विचार यह है कि दो देशों के कारोबारी जब एक-दूसरे के साथ व्यापार करें तो भुगतान के लिए किसी तीसरी मुद्रा को अनिवार्य मध्यस्थ बनाने की जरूरत कम हो। उदाहरण के लिए, यदि भारत और किसी अन्य ब्रिक्स देश के बीच व्यापार होता है तो भुगतान व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है जिसमें खरीदार की स्थानीय मुद्रा से विक्रेता की स्थानीय मुद्रा में लेनदेन का निपटारा हो। इसके लिए विनिमय दर, तरलता, बैंकिंग संपर्क और भुगतान निपटान से जुड़े तकनीकी प्रबंध की आवश्यकता होगी। इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल ढांचे से जोड़कर अधिक तेज और पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा सकती है।
रूस के अनुभव ने वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की जरूरत बढ़ाई
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में वैकल्पिक भुगतान तंत्र की चर्चा के पीछे रूस का अनुभव भी एक बड़ा कारण है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूसी बैंकों और संस्थानों के लिए पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था तक पहुंच कई स्तरों पर प्रभावित हुई। इससे यह सवाल अधिक प्रमुख हुआ कि यदि किसी देश को प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क से सीमित कर दिया जाए तो वह अपने व्यापार और वित्तीय लेनदेन को किस तरह जारी रख सकता है। ब्रिक्स के भीतर वैकल्पिक भुगतान संपर्क विकसित करने की बहस को इसी व्यापक भू-आर्थिक बदलाव के संदर्भ में देखा जा सकता है।
भारत के लिए भी भुगतान व्यवस्था में विविधता का अपना महत्व है। भारत का व्यापारिक हित कई अलग-अलग क्षेत्रों और देशों में फैला हुआ है। ऊर्जा आयात, कच्चे माल की खरीद, विनिर्माण, सेवाओं और निर्यात के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार की अस्थिरता का असर भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है। यदि कुछ व्यापारिक साझेदारों के साथ स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवहारिक व्यवस्था विकसित होती है तो मुद्रा विनिमय की कुछ लागत और बाहरी वित्तीय झटकों का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इससे डॉलर की भूमिका तत्काल समाप्त नहीं होगी।
बहु-सीबीडीसी सेतु से कैसे बदल सकता है भुगतान का तरीका
प्रस्तावित व्यवस्था में बहु-सीबीडीसी यानी कई देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने वाला ढांचा एक विकल्प हो सकता है। इसके अलावा अलग-अलग देशों के तेज भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ने की व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है। ऐसी तकनीकी संरचना में भुगतान निर्देश, मुद्रा विनिमय और निपटान को डिजिटल माध्यम से अधिक तेजी से पूरा करने की कोशिश की जाएगी। यदि इसे सफलतापूर्वक लागू किया जाता है तो पारंपरिक सीमा-पार भुगतान में शामिल कई मध्यस्थों की जरूरत कम हो सकती है।
ब्लॉकचेन जैसी वितरित लेखा प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी ऐसी प्रणालियों में संभावित तकनीकी विकल्प के रूप में किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होगी। भुगतान सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण, मुद्रा विनिमय दर, धनशोधन विरोधी नियम और विभिन्न देशों के वित्तीय कानूनों में तालमेल भी उतना ही जरूरी होगा। इसलिए डिजिटल सेतु का निर्माण केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि सदस्य देशों के बीच व्यापक वित्तीय और नियामकीय सहयोग की प्रक्रिया होगी।
भारत के लिए रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने का अवसर
स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ने का एक संभावित लाभ भारतीय रुपये की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता में वृद्धि भी हो सकता है। यदि भारतीय कंपनियां कुछ प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ रुपये में भुगतान और निपटान अधिक आसानी से कर सकें तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग का दायरा बढ़ सकता है। इससे भारत की भुगतान प्रणाली और वित्तीय अवसंरचना को वैश्विक स्तर पर अधिक महत्व मिलने की संभावना बनेगी। भारत पहले ही डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमता के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की दिशा में काम कर रहा है।
हालांकि रुपये को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की प्रक्रिया केवल भुगतान नेटवर्क जोड़ने से पूरी नहीं होगी। इसके लिए गहरे और भरोसेमंद वित्तीय बाजार, पर्याप्त मुद्रा तरलता, स्थिर व्यापक आर्थिक वातावरण, मजबूत संस्थागत ढांचा और विदेशी निवेशकों के लिए आसान वित्तीय पहुंच आवश्यक होगी। इसलिए ब्रिक्स भुगतान पहल को रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में एक संभावित कदम माना जा सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान समझना उचित नहीं होगा। भारत की मुद्रा को वैश्विक व्यापार में अधिक व्यापक भूमिका दिलाने के लिए कई समानांतर आर्थिक सुधारों की जरूरत होगी।
तेल कारोबार और डॉलर की भूमिका पर भी पड़ेगा असर
ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाओं में ऊर्जा व्यापार का महत्व देखते हुए स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था का सबसे बड़ा परीक्षण तेल और गैस कारोबार के क्षेत्र में हो सकता है। मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है और ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की मुद्रा तथा चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक के लिए डॉलर में महंगे तेल की खरीद का सीधा प्रभाव आयात बिल और रुपये की विनिमय दर पर पड़ सकता है।
यदि भविष्य में ब्रिक्स देशों के बीच ऊर्जा व्यापार का कुछ हिस्सा स्थानीय मुद्राओं या वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के जरिए होने लगे तो भुगतान जोखिमों को विविध बनाने की संभावना होगी। लेकिन तेल का वैश्विक बाजार अभी भी व्यापक रूप से डॉलर आधारित है और इसकी कीमतों तथा अनुबंधों में डॉलर की केंद्रीय भूमिका बनी हुई है। इसलिए स्थानीय मुद्रा भुगतान व्यवस्था विकसित होने के बावजूद डॉलर की भूमिका निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना नहीं है। वास्तविक बदलाव धीरे-धीरे और सीमित व्यापारिक गलियारों से शुरू हो सकता है।
ब्रिक्स देशों के लिए आर्थिक मजबूती का नया आधार
ब्रिक्स के विस्तार के साथ समूह में शामिल अर्थव्यवस्थाओं की विविधता और बढ़ी है। ऐसे समूह में साझा वित्तीय व्यवस्था बनाना चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए साझा डिजिटल ढांचा एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक क्षेत्र हो सकता है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक संपर्क बढ़ाने, भुगतान लागत घटाने और बाहरी वित्तीय झटकों से निपटने के लिए अतिरिक्त विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।
भारत के प्रस्ताव की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश तकनीकी मानकों, भुगतान सुरक्षा, विनिमय दर व्यवस्था और नियामकीय समन्वय पर कितना सहमत होते हैं। यदि ब्रिक्स देशों के तेज भुगतान नेटवर्क वास्तव में आपस में जुड़ते हैं और स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन बड़े पैमाने पर संभव होता है तो यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण प्रयोग साबित हो सकता है। यह डॉलर का तत्काल विकल्प नहीं होगा, लेकिन वैश्विक व्यापार में एक ही मुद्रा और एक ही भुगतान ढांचे पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की दिशा में जरूर कदम हो सकता है।
भारत का दांव क्यों माना जा रहा है रणनीतिक
भारत के लिए यह पहल आर्थिक लाभ के साथ रणनीतिक महत्व भी रखती है। एक ओर इससे देश अपने डिजिटल भुगतान ढांचे की क्षमता को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जोड़ सकता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर भारत वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार और विकल्पों की बहस को दिशा देने की कोशिश कर सकता है। भारत का जोर साझा मुद्रा के बजाय मौजूदा राष्ट्रीय मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों के बीच संपर्क बढ़ाने पर रहता है तो इससे अलग-अलग आर्थिक नीतियों वाले देशों के बीच सहमति बनाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
फिलहाल इस प्रस्ताव को डॉलर को हटाने की घोषणा के रूप में देखना अतिशयोक्ति होगी। अमेरिकी डॉलर की वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार में भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है। लेकिन यदि स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की लागत और जटिलता लगातार घटती है, तो अंतरराष्ट्रीय कारोबार में मुद्रा विकल्पों की संख्या बढ़ सकती है। ब्रिक्स में भारत का प्रस्ताव इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक प्रयोग हो सकता है, जिसका असर आने वाले वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के स्वरूप पर दिखाई दे सकता है।