भारत और जापान के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान जारी संयुक्त बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। दोनों देशों ने स्पष्ट किया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार आवश्यक है। भारत और जापान ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए एक-दूसरे की दावेदारी का समर्थन दोहराते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधिक, प्रभावी और समकालीन संस्था बनाने के लिए सुधार प्रक्रिया में अब और विलंब नहीं होना चाहिए। दोनों देशों ने इस दिशा में समान विचारधारा वाले देशों के साथ मिलकर प्रयास तेज करने की प्रतिबद्धता भी जताई।
G-4 देशों की साझा रणनीति से बढ़ी उम्मीदें
भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार के पक्षधर रहे हैं। इन चार देशों के समूह को जी-4 के नाम से जाना जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की वकालत करता है। इन देशों का तर्क है कि वर्ष 1945 में बनी सुरक्षा परिषद उस समय की शक्ति संरचना को दर्शाती थी, जबकि आज विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। इसलिए सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्यों को शामिल करना उसकी वैधता, प्रभावशीलता और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए आवश्यक माना जा रहा है। दोनों देशों ने अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया के तहत पाठ-आधारित औपचारिक बातचीत शुरू करने और समयबद्ध परिणाम हासिल करने पर भी जोर दिया।
भारत की दावेदारी क्यों मानी जाती है मजबूत?
भारत की स्थायी सदस्यता की मांग कई ठोस आधारों पर टिकी हुई है। विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था, रक्षा क्षमता, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद विरोधी सहयोग तथा बहुपक्षीय कूटनीति जैसे क्षेत्रों में लगातार अपनी भूमिका मजबूत करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भारत का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है और दशकों से भारतीय सैनिक विभिन्न मिशनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। इसके अलावा विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से उठाने के कारण भी भारत को व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है। फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई प्रमुख देशों ने भारत की स्थायी सदस्यता का सार्वजनिक समर्थन किया है।
सुधार की राह में आखिर कहां अटका है मामला?
सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर व्यापक सहमति बनने के बावजूद प्रक्रिया अब भी जटिल बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन के लिए महासभा में आवश्यक बहुमत के साथ-साथ वर्तमान पांचों स्थायी सदस्यों की स्वीकृति भी जरूरी होती है। इसके अतिरिक्त सदस्य देशों के बीच नए स्थायी सदस्यों की संख्या, वीटो अधिकार, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तथा विस्तार के स्वरूप को लेकर भी अलग-अलग मत हैं। कुछ देश नए स्थायी सदस्यों के पक्ष में हैं, जबकि कुछ केवल अस्थायी सदस्यता के विस्तार का समर्थन करते हैं। इन मतभेदों के कारण कई वर्षों से सुधार प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है।
बदलती विश्व व्यवस्था में क्यों बढ़ रही है सुधार की मांग?
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की वैश्विक चुनौतियां वर्ष 1945 की परिस्थितियों से पूरी तरह भिन्न हैं। जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, महामारी, खाद्य सुरक्षा और भू-राजनीतिक तनाव जैसे नए मुद्दों से निपटने के लिए अधिक प्रतिनिधिक और समावेशी सुरक्षा परिषद की आवश्यकता महसूस की जा रही है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे विशाल क्षेत्रों की सीमित भागीदारी को भी सुधार की प्रमुख वजह माना जाता है। भारत और जापान का मानना है कि यदि सुरक्षा परिषद में वर्तमान वैश्विक शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को उचित स्थान दिया जाता है, तो संयुक्त राष्ट्र की निर्णय क्षमता और विश्वसनीयता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने बहुपक्षीय मंचों पर अपनी सक्रियता लगातार बढ़ाई है। वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को प्रमुखता देना, विकासशील देशों के हितों की वकालत करना, मानवीय सहायता, आपदा राहत, जलवायु न्याय और अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में सक्रिय योगदान भारत की विदेश नीति की महत्वपूर्ण विशेषताएं बनकर उभरी हैं। यही कारण है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की भारत की दावेदारी को पहले की तुलना में अधिक व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हो रहा है। भारत और जापान का साझा रुख यह संकेत देता है कि आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र सुधार का मुद्दा वैश्विक कूटनीति के केंद्र में बना रह सकता है।