MP TET Controversy 2026: मध्य प्रदेश में शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET की अनिवार्यता का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले को लेकर ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। एसोसिएशन की ओर से 30 अगस्त 2026 को याचिका दायर किए जाने की जानकारी सामने आई है। याचिका में खास तौर पर उन शिक्षकों को राहत देने की मांग की गई है, जिनकी नियुक्ति वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुई थी। एसोसिएशन का कहना है कि उस समय नियुक्त किए गए शिक्षकों ने नियुक्ति के दौरान निर्धारित पात्रता संबंधी परीक्षा पास की थी। ऐसे में उन्हें दोबारा TET पास करने की अनिवार्यता के दायरे में रखना उचित नहीं है। अब इस याचिका के बाद संबंधित शिक्षकों की नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्रवाई और रुख पर बनी हुई है।
2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को क्या राहत चाहिए?
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने अपनी याचिका में एक विशेष वर्ग के शिक्षकों के लिए राहत की मांग की है। एसोसिएशन के मुताबिक, 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को वर्तमान TET अनिवार्यता से बाहर रखा जाना चाहिए। संगठन का तर्क है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू पात्रता और नियमों के आधार पर हुई थी। यानी जिन शिक्षकों ने नियुक्ति के समय निर्धारित पात्रता परीक्षा या संबंधित योग्यता पूरी कर ली थी, उनसे अब दोबारा TET पास करने की शर्त नहीं लगाई जानी चाहिए।
एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
याचिका में मुख्य तौर पर नियुक्ति के समय पूरी की गई पात्रता का मुद्दा उठाया गया है। एसोसिएशन का कहना है कि 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के समय लागू व्यवस्था के तहत पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की थी। ऐसे में बाद में TET की अनिवार्यता लागू होने पर उन्हें फिर से उसी तरह की पात्रता परीक्षा के दायरे में लाना उचित नहीं माना जाना चाहिए। इसी आधार पर संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से इन शिक्षकों को विशेष राहत देने की मांग की है।
TET की अनिवार्यता को लेकर क्यों है विवाद?
शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET का उद्देश्य शिक्षण पदों के लिए अभ्यर्थियों की पात्रता और शिक्षण क्षमता से संबंधित निर्धारित मानकों को पूरा करना है। लेकिन पुराने समय में नियुक्त शिक्षकों को बाद में लागू होने वाली पात्रता संबंधी शर्तों के दायरे में लाने को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। खासतौर पर उन शिक्षकों के मामले में बहस होती है, जिनकी नियुक्ति उस समय के नियमों के अनुसार पूरी हो चुकी थी। मध्य प्रदेश में भी इसी मुद्दे को लेकर शिक्षकों का एक वर्ग राहत की मांग कर रहा है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद इस पर आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने क्यों उठाया मुद्दा?
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने पुराने नियुक्त शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए यह याचिका दायर की है। एसोसिएशन की ओर से यह मांग रखी गई है कि वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों की नियुक्ति के समय की पात्रता को ध्यान में रखते हुए उन्हें TET की अनिवार्यता से छूट दी जाए। संगठन का मानना है कि जिन शिक्षकों ने नियुक्ति के वक्त आवश्यक पात्रता पूरी की थी, उनके लिए बाद में दोबारा TET की शर्त लागू करना अलग से विचार किए जाने वाला विषय है।
अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी नजर
याचिका दाखिल होने के बाद अब संबंधित शिक्षकों की निगाह सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर है। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अदालत इस याचिका पर क्या रुख अपनाती है और आगे की सुनवाई किस दिशा में बढ़ती है। अगर अदालत इस मामले में राहत देती है, तो 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों के लिए इसका सीधा असर पड़ सकता है। वहीं अदालत की ओर से आने वाली किसी भी टिप्पणी या आदेश के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है। फिलहाल इस मामले में अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी।
पुराने शिक्षकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह मामला उन शिक्षकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी नियुक्ति कई वर्ष पहले निर्धारित नियमों के तहत हुई थी। ऐसे में वर्तमान पात्रता शर्तों को लेकर उन्हें किस तरह की व्यवस्था के तहत रखा जाए, यह एक अहम कानूनी और प्रशासनिक सवाल बन गया है। एसोसिएशन की याचिका का उद्देश्य इसी वर्ग के शिक्षकों को विशेष राहत दिलाना है। यदि मांग स्वीकार होती है तो पुराने नियुक्त शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से राहत मिल सकती है। हालांकि फिलहाल यह केवल एसोसिएशन की ओर से की गई मांग है। अंतिम निर्णय अदालत के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगी। अदालत याचिका पर विचार करने के बाद संबंधित पक्षों से जवाब मांग सकती है और मामले की सुनवाई आगे बढ़ सकती है। जब तक अदालत की ओर से कोई स्पष्ट आदेश नहीं आता, तब तक TET की अनिवार्यता से संबंधित नियमों की मौजूदा स्थिति पर ही अमल किया जाएगा। इसलिए संबंधित शिक्षकों के लिए जरूरी है कि वे मामले की आधिकारिक कानूनी स्थिति और विभागीय निर्देशों पर नजर बनाए रखें।