पटना - बिहार में चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी के बीच जमाखोरी और कालाबाजारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पटना में कुछ गोदामों की जांच के बाद चीनी की कीमत 70 रुपये प्रति किलो से नीचे आने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलते हैं कि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतों को ऊंचे स्तर तक ले जाने की कोशिश की जा रही थी।
जांच बढ़े तो कम हो सकती हैं कीमतें
जानकारों के मुताबिक, अगर चीनी के स्टॉक की नियमित और प्रभावी निगरानी की जाए तो बाजार में इसकी कीमत 50 रुपये प्रति किलो के आसपास आ सकती है। मौजूदा स्थिति में उपलब्ध स्टॉक मांग के लिहाज से पर्याप्त बताया जा रहा है। ऐसे में कीमतों में तेजी का एक कारण आपूर्ति की वास्तविक कमी के बजाय जमाखोरी या बाजार में कृत्रिम दबाव बनाए जाने को माना जा रहा है। गोदामों की जांच के बाद कीमतों में आई गिरावट ने भी इस आशंका को मजबूत किया है।
बिहार में गन्ने का उत्पादन बना चिंता का विषय
चीनी की कीमतों के बीच बिहार के गन्ना उद्योग के सामने भी चुनौती कम नहीं है। पिछले पेराई सत्र में राज्य में गन्ने का उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहा था। वहीं आगामी सीजन में उत्पादन को लेकर भी चिंता बनी हुई है। गन्ना उद्योग विभाग ने 2026-27 के लिए 2,55,081 हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही करीब 1.74 करोड़ टन गन्ना उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। राज्य की सभी 10 कार्यशील चीनी मिलों को मिलाकर करीब 809 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई का लक्ष्य है। बचा हुआ गन्ना गुड़ बनाने के अलावा उत्तर प्रदेश की कुछ चीनी मिलों को भी भेजा जा सकता है।
पिछले सीजन में 58.65 लाख टन चीनी का उत्पादन
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में बिहार की 10 चीनी मिलों ने मिलकर करीब 56.90 लाख टन गन्ने की पेराई की थी। इससे लगभग 5.86 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। राज्य का यह उत्पादन देश में कुल चीनी उत्पादन के ढाई प्रतिशत से भी कम रहा। हालांकि, बिहार की चीनी रिकवरी दर 10.3 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर बताई गई।
कम रकबा और मौसम से बढ़ी मुश्किल
इस बार गन्ने के उत्पादन पर कई कारणों का असर पड़ने की आशंका है। गन्ने की खेती का रकबा पिछले साल की तुलना में करीब 0.43 लाख हेक्टेयर कम हुआ है। इसके अलावा बारिश भी अनुमान के मुताबिक नहीं हुई। निचले इलाकों में कुछ जगहों पर जलभराव की समस्या भी रही है। वहीं फसल में थ्रिप्स रोग का प्रकोप भी किसानों के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। इस बीमारी से गन्ने की पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधे की बढ़वार प्रभावित होती है।
रिकवरी रेट पर भी नजर
रकबा, मौसम और फसल रोग से जुड़ी परिस्थितियां गन्ने में रस की मात्रा को प्रभावित कर सकती हैं। इसका सीधा असर चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है। किसी निश्चित मात्रा के गन्ने से कितनी चीनी प्राप्त होती है, इसे रिकवरी रेट कहा जाता है। यदि गन्ने में रस की मात्रा घटती है तो चीनी की रिकवरी भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस सीजन में उत्पादन के साथ रिकवरी रेट को लेकर भी नजर बनी हुई है।
सितंबर से 15 दिन का बिक्री कोटा
चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने और बाजार में नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने बिक्री व्यवस्था में बदलाव किया है। सितंबर से चीनी मिलों को अब पूरे महीने के लिए एक साथ बिक्री कोटा देने के बजाय 15-15 दिन के आधार पर कोटा निर्धारित किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य इस व्यवस्था के जरिए बाजार में चीनी की उपलब्धता पर ज्यादा प्रभावी निगरानी रखना है। इससे किसी क्षेत्र में कृत्रिम कमी पैदा होने की स्थिति में समय रहते कार्रवाई करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
फिलहाल बिहार में चीनी की कीमतों पर निगरानी, गोदामों की जांच और आपूर्ति व्यवस्था को लेकर प्रशासन की सक्रियता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले दिनों में इन कदमों का असर खुदरा बाजार की कीमतों पर कितना पड़ता है, इस पर नजर रहेगी।