नई दिल्ली. जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और चरम मौसमीय घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य और जीवनशैली पर भी दिखाई देने लगा है। हाल ही में प्रकाशित क्लाइमेट सेंट्रल की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में बढ़ती गर्म रातों के कारण प्रत्येक व्यक्ति को औसतन वर्ष में लगभग 56 घंटे की नींद का नुकसान हो रहा है। यह स्थिति केवल असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन से जुड़ी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। भारत उन देशों में शामिल है, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण रातों के तापमान में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है और इसका असर लोगों की नींद पर सबसे अधिक देखा जा रहा है।
गर्म रातें बनीं वैश्विक स्वास्थ्य संकट की नई चेतावनी
क्लाइमेट सेंट्रल ने विश्व के 1,338 शहरों का विस्तृत विश्लेषण करते हुए पाया कि वर्ष 1970 के दशक की तुलना में गर्म रातों के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि रात के समय तापमान में लगातार बढ़ोतरी मानव शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी को प्रभावित करती है। सामान्य परिस्थितियों में सोते समय शरीर का तापमान धीरे-धीरे कम होता है, जिससे गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद संभव हो पाती है। लेकिन जब रातें अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहती हैं, तब शरीर स्वयं को पर्याप्त रूप से ठंडा नहीं कर पाता और नींद बार-बार टूटती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति पर्याप्त समय बिस्तर पर बिताने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण विश्राम से वंचित रह जाता है।
भारत में दक्षिणी और तटीय शहरों पर सबसे अधिक प्रभाव
रिपोर्ट के अनुसार भारत के दक्षिणी और समुद्री तटों से जुड़े शहरों में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। चेन्नई, नेल्लोर और पुडुचेरी जैसे शहरों में रहने वाले लोगों को वर्षभर में लगभग 90 से 93 घंटे तक नींद का नुकसान हो रहा है। इसके अतिरिक्त तिरुचिरापल्ली, कोच्चि, कोझिकोड, गुंटूर, विशाखापत्तनम और मुंबई जैसे शहर भी अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। इन क्षेत्रों में समुद्री आर्द्रता और बढ़ते न्यूनतम तापमान के कारण रात के समय भी वातावरण पर्याप्त ठंडा नहीं हो पाता। इसके विपरीत अपेक्षाकृत ठंडे क्षेत्रों, जैसे श्रीनगर, में यह प्रभाव काफी कम दर्ज किया गया है, जहां वार्षिक नींद की कमी लगभग 27 घंटे के आसपास आंकी गई है।
बढ़ता न्यूनतम तापमान बना प्रमुख कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में रातों के तापमान में लगातार वृद्धि इस समस्या की सबसे बड़ी वजह है। वर्ष 1991 से 2020 के बीच देश में रात का औसत न्यूनतम तापमान लगभग 19.3 डिग्री सेल्सियस था, जबकि वर्ष 2024 में यह बढ़कर लगभग 20.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह पिछले एक शताब्दी से अधिक समय में दर्ज सबसे ऊंचे स्तरों में शामिल है। तापमान में यह मामूली दिखने वाली वृद्धि वास्तव में मानव शरीर की जैविक प्रक्रियाओं पर गहरा प्रभाव डालती है। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट संरचनाओं, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न 'हीट आइलैंड प्रभाव' रात के समय भी गर्मी को बनाए रखता है, जिससे राहत नहीं मिल पाती।
नींद की कमी से बढ़ रहे स्वास्थ्य संबंधी खतरे
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, मानसिक स्वास्थ्य, स्मरण शक्ति और हृदय संबंधी कार्यप्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक है। लगातार नींद की कमी उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, अवसाद, चिंता और हृदय रोगों जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती है। इसके अतिरिक्त कार्यस्थल पर उत्पादकता में कमी, सड़क दुर्घटनाओं की संभावना तथा निर्णय क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकती है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ अनुकूलन भी जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के वैश्विक प्रयास ही पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि शहरों की संरचना और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में भी बदलाव आवश्यक है। अधिक हरित क्षेत्र विकसित करना, भवन निर्माण में तापरोधी तकनीकों का उपयोग, शहरी ताप द्वीप प्रभाव को कम करना तथा ऊर्जा दक्ष शीतलन प्रणालियों को बढ़ावा देना भविष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन चुका है। साथ ही नागरिकों को भी गर्म मौसम में पर्याप्त जल सेवन, हल्का भोजन, सोने के स्थान का उचित वेंटिलेशन तथा नियमित नींद की आदतों पर विशेष ध्यान देना होगा। जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा व्यापक वैश्विक प्रश्न बन चुका है।