भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है और हाल के वर्षों में सोने की मांग लगातार बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025-26 में सोने का आयात बढ़कर लगभग 71.9 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 24 प्रतिशत अधिक बताया जा रहा है। इतनी बड़ी मात्रा में सोना आयात होने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और चालू खाते के घाटे पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि सरकार अब सोने के आयात, खपत और उससे जुड़े वित्तीय उत्पादों पर अधिक बारीकी से नजर रख रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सोने की आयात निर्भरता कम होती है तो इससे रुपये की स्थिरता और व्यापक आर्थिक संतुलन को मजबूती मिल सकती है।
प्रधानमंत्री की अपील के बाद बढ़ी नीति स्तर पर सक्रियता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लोगों से एक निश्चित अवधि तक सोने की खरीद सीमित करने की अपील को भी इसी व्यापक आर्थिक सोच से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि घरेलू बचत का बड़ा हिस्सा यदि उत्पादक निवेशों की ओर जाए तो अर्थव्यवस्था को अधिक लाभ मिल सकता है। इसी पृष्ठभूमि में सोने और चांदी पर आयात शुल्क में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई थी। अब बैंकों से विस्तृत जानकारी मांगना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार सोने से जुड़े वित्तीय प्रवाह और बाजार की वास्तविक स्थिति का व्यापक आकलन करना चाहती है।
बैंकों से मांगा गया विस्तृत डेटा
सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले वित्तीय सेवा विभाग ने बैंकों से वर्ष 2023 से अब तक के गोल्ड मेटल लोन और सोने के बदले दिए गए ऋणों का विस्तृत विवरण मांगा है। इसमें ऋण का कुल मूल्य, ऋण की मात्रा, ग्राहकों की संख्या, अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं की जानकारी, पोर्टफोलियो का आकार, गिरवी रखे गए सोने की मात्रा और उधारकर्ताओं से जुड़े आंकड़े शामिल हैं। इस प्रकार का डेटा संग्रह केवल सांख्यिकीय अभ्यास नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि देश में सोने की वित्तीय मांग किस स्तर पर पहुंच चुकी है और इसका बैंकिंग प्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
क्या होता है गोल्ड मेटल लोन और क्यों है महत्वपूर्ण?
गोल्ड मेटल लोन एक विशेष प्रकार की वित्तीय व्यवस्था है, जिसके तहत बैंक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सोना उधार लेकर आभूषण उद्योग से जुड़े कारोबारियों को उपलब्ध कराते हैं। इससे जूलर्स को बाजार से सीधे बड़ी मात्रा में सोना खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती और उनकी कार्यशील पूंजी पर दबाव कम होता है। भारत में यह व्यवस्था सबसे पहले निर्यातकों के लिए शुरू की गई थी, बाद में इसका दायरा आभूषण कारोबार तक बढ़ाया गया। चूंकि देश का जेम्स और ज्वेलरी क्षेत्र बड़े पैमाने पर आयातित सोने पर निर्भर है, इसलिए गोल्ड मेटल लोन इस उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
आरबीआई और सरकार दोनों क्यों कर रहे निगरानी?
सूत्रों के मुताबिक बैंकों से जानकारी मांगे जाने से पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष के लिए गोल्ड मेटल लोन से जुड़े अनुमान और जोखिम मूल्यांकन की जानकारी मांगी थी। इससे संकेत मिलता है कि नियामक और सरकार दोनों इस क्षेत्र की गतिविधियों पर गहरी नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गोल्ड लोन बाजार के तेजी से विस्तार, बढ़ती सोना कीमतों और आयात निर्भरता को देखते हुए भविष्य में कुछ नियामकीय बदलाव, रिपोर्टिंग मानकों में सुधार या निगरानी तंत्र को और सख्त बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से किसी नए नियम की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
आगे क्या हो सकता है सरकार का बड़ा कदम?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार का उद्देश्य केवल आयात कम करना नहीं, बल्कि घरेलू बचत को अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर प्रोत्साहित करना भी हो सकता है। आने वाले समय में गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड, गोल्ड रीसाइक्लिंग और घरेलू सोना जमा योजनाओं को और बढ़ावा देने जैसे कदमों पर विचार किया जा सकता है। यदि सरकार को यह महसूस होता है कि अत्यधिक सोना आयात आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है, तो आयात नीति, ऋण मानकों या निवेश विकल्पों से जुड़ी नई पहलें भी सामने आ सकती हैं। फिलहाल बैंकों से मांगा गया यह विस्तृत डेटा सरकार की भविष्य की रणनीति का आधार बन सकता है और इसी से तय होगा कि देश की स्वर्ण अर्थव्यवस्था को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए।