ईरान युद्ध के कारण पश्चिम एशिया का सामरिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के चलते जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है और इसका सीधा असर भारत की उर्वरक आपूर्ति पर पड़ने लगा है। जानकारी के मुताबिक फर्टिलाइजर लेकर भारत आने वाले 17 जहाज फिलहाल फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। ऐसे समय में जब देश में खरीफ फसलों की बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है, खाद आपूर्ति में यह बाधा सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
सरकार तलाश रही वैकल्पिक रास्ता
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार अब वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर विचार कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, फारस की खाड़ी के बंदरगाहों से उर्वरक को सड़क मार्ग के जरिए सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। इसके बाद वहां से जहाजों के जरिए भारत भेजा जाएगा। हालांकि यह मार्ग काफी लंबा और महंगा माना जा रहा है। यानबू बंदरगाह फारस की खाड़ी से करीब 1200 किलोमीटर दूर स्थित है और इस रूट से माल पहुंचाने में सामान्य समय से 60 से 70 दिन अधिक लग सकते हैं।
खरीफ सीजन से पहले बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि जून के मध्य तक खरीफ फसलों के लिए उर्वरकों की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है। ऐसे में अगर आपूर्ति बाधित रही तो किसानों को खाद संकट का सामना करना पड़ सकता है। खासकर यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है। कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि हालात लंबे समय तक बिगड़े रहे तो इसका असर केवल खरीफ ही नहीं बल्कि आगामी रबी सीजन पर भी दिखाई दे सकता है।
युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में उछली कीमतें
ईरान युद्ध का असर केवल सप्लाई चेन तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भी भारी उछाल देखा जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2026 के बाद यूरिया की कीमतों में 120 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं डीएपी की कीमत में 38 प्रतिशत, सल्फर में 87 प्रतिशत और अमोनिया में 84 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी आयात लागत को और बढ़ा दिया है, जिससे भारत पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बन रहा है।
आयात पर भारी निर्भरता बनी बड़ी चुनौती
भारत उर्वरकों की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश में हर साल करीब 40 मिलियन टन यूरिया की खपत होती है, जिसमें 8 से 10 मिलियन टन आयात किया जाता है। डीएपी की करीब 60 प्रतिशत जरूरत विदेशों से पूरी होती है, जबकि पोटाश के मामले में भारत लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक संकट और समुद्री मार्गों में रुकावट का सीधा असर भारतीय कृषि व्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है।
बढ़ सकता है सरकार का सब्सिडी बोझ
उर्वरकों की बढ़ती कीमतों का असर सरकारी सब्सिडी पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले वित्त वर्ष में फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये था, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए इसके 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। सरकार फिलहाल किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालने से बचना चाहती है, इसलिए सब्सिडी के जरिए कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की जा रही है।
कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अहम परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत की खाद सुरक्षा और आयात निर्भरता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आने वाले समय में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क तैयार करने और रणनीतिक भंडारण मजबूत करने की जरूरत और अधिक महसूस की जाएगी। फिलहाल सरकार हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है और जल्द से जल्द फंसी खेपों को भारत पहुंचाने के विकल्प तलाश रही है।