असम सरकार ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के आसपास लागू डिफॉल्ट 10 किलोमीटर के इको-सेंसिटिव जोन को घटाकर 1 से 3 किलोमीटर करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष रखा है। राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्ताव का उद्देश्य राष्ट्रीय उद्यान की सीमा में किसी प्रकार का बदलाव करना नहीं, बल्कि उसके आसपास रहने वाली आबादी के लिए लागू नियामकीय दायरे को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाना है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की मौजूदा सीमाएं पूरी तरह यथावत रहेंगी। प्रस्तावित बदलाव केवल बाहरी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र की सीमा से संबंधित है, जिसे राज्य सरकार विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में पेश कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का दिया जा रहा हवाला
असम सरकार ने अपने प्रस्ताव के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्देशों का हवाला दिया है, जिनमें पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर परिस्थितियों के अनुरूप 1 से 3 किलोमीटर तक का दायरा अधिसूचित करने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित दूरी राष्ट्रीय उद्यान के कोर क्षेत्र से नहीं, बल्कि उसकी अधिसूचित बाहरी सीमा से मापी जाएगी। सरकार का तर्क है कि इस अंतर को समझना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इको-सेंसिटिव जोन का उद्देश्य संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं का विस्तार करना नहीं, बल्कि उसके आसपास ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करना है जो वन्यजीवों और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। इसी आधार पर राज्य सरकार अपने प्रस्ताव को न्यायिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप बता रही है।
10 किलोमीटर के दायरे से स्थानीय आबादी की मुश्किलें
राज्य सरकार का कहना है कि काजीरंगा के आसपास 10 किलोमीटर का व्यापक इको-सेंसिटिव जोन स्थानीय और मूल निवासी समुदायों के सामने कई व्यावहारिक समस्याएं खड़ी कर सकता है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को आवास निर्माण, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों से जुड़े कार्यों में अतिरिक्त नियामकीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार का दावा है कि संरक्षण संबंधी नियमों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका की जरूरतों की भी अनदेखी न हो। प्रस्तावित 1 से 3 किलोमीटर का दायरा इसी स्थानीय वास्तविकता को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने की बात कही जा रही है।
सरकार के सामने संरक्षण और विकास का दोहरा दबाव
काजीरंगा केवल असम ही नहीं, बल्कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं में शामिल है। यह राष्ट्रीय उद्यान एक सींग वाले भारतीय गैंडे की बड़ी आबादी के लिए विश्वभर में जाना जाता है और इसका पारिस्थितिक महत्व भी बेहद व्यापक है। दूसरी ओर, संरक्षित क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों के लिए कृषि, आवास, व्यापार और रोजगार जैसी जरूरतें लगातार बनी रहती हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह है कि विकास गतिविधियों को पूरी तरह रोकने के बजाय उनके लिए ऐसे नियम बनाए जाएं, जिनसे वन्यजीव गलियारों, जंगल, जलस्रोत और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यही कारण है कि इको-सेंसिटिव जोन की सीमा को लेकर होने वाला फैसला केवल प्रशासनिक सीमा निर्धारण का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नीति का महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।
नुमालीगढ़ रिफाइनरी को लेकर मुख्यमंत्री की चेतावनी
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रस्ताव का बचाव करते हुए आसपास मौजूद आर्थिक गतिविधियों का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि यदि काजीरंगा के चारों ओर 10 किलोमीटर का दायरा बिना स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखे समान रूप से लागू किया गया, तो इसका असर आसपास के उद्योगों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। उन्होंने नुमालीगढ़ रिफाइनरी का उदाहरण देते हुए गंभीर परिणामों की आशंका जताई है। सरकार का तर्क है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़ी महत्वपूर्ण गतिविधियों को ध्यान में रखे बिना व्यापक प्रतिबंध लगाने से क्षेत्र के विकास पर असर पड़ सकता है। हालांकि ऐसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर पर्यावरणीय नियमों और अलग-अलग स्वीकृतियों की अपनी प्रक्रिया होती है, इसलिए प्रस्ताव के अंतिम स्वरूप में इन सभी पहलुओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
विपक्ष ने उठाए पर्यावरण संरक्षण पर सवाल
राज्य सरकार के प्रस्ताव पर विपक्ष की ओर से विरोध जताया गया है। विपक्ष का मूल तर्क है कि काजीरंगा जैसे अत्यंत संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र के आसपास इको-सेंसिटिव जोन का दायरा कम करने से संरक्षित क्षेत्र पर बाहरी दबाव बढ़ सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता यह रहती है कि राष्ट्रीय उद्यान की वास्तविक सीमा के बाहर का क्षेत्र भी वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि जानवर भोजन, पानी और सुरक्षित आवागमन के लिए अक्सर संरक्षित क्षेत्र से बाहर निकलते हैं। ऐसे में केवल पार्क की सीमा को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आसपास का भू-दृश्य, वन्यजीव गलियारे, जल निकाय और प्राकृतिक आवास भी संरक्षण की व्यापक रणनीति का हिस्सा होते हैं।
काजीरंगा के लिए बफर क्षेत्र क्यों महत्वपूर्ण
किसी राष्ट्रीय उद्यान के आसपास का इको-सेंसिटिव क्षेत्र सामान्य अर्थों में एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। इसका उद्देश्य हर मानवीय गतिविधि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करना है जो संरक्षित क्षेत्र की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। काजीरंगा के मामले में यह पहलू और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि बाढ़, नदी तंत्र और वन्यजीवों की आवाजाही यहां के पारिस्थितिक तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। उद्यान की सीमाओं के आसपास निर्माण, औद्योगिक गतिविधि, खनन, यातायात और भूमि उपयोग में बड़े बदलाव वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए प्रस्तावित सीमा में किसी भी बदलाव के साथ वैज्ञानिक आकलन और स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन अहम होगा।
अब केंद्र के फैसले पर टिकी निगाहें
असम सरकार का प्रस्ताव अब केंद्र सरकार के विचाराधीन है और अंतिम निर्णय में पर्यावरणीय, कानूनी तथा स्थानीय प्रशासनिक पहलुओं का परीक्षण महत्वपूर्ण रहेगा। एक तरफ राज्य सरकार स्थानीय आबादी की बुनियादी जरूरतों और आर्थिक गतिविधियों के लिए अधिक व्यावहारिक नियामकीय व्यवस्था चाहती है, वहीं दूसरी तरफ काजीरंगा की वैश्विक संरक्षण पहचान को देखते हुए पर्यावरणीय सुरक्षा से समझौता न करने की मांग उठ रही है। ऐसे में आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि इको-सेंसिटिव जोन की सीमा तय करते समय स्थानीय लोगों की आजीविका, विकास की जरूरतों और वन्यजीव संरक्षण के बीच वास्तविक संतुलन बनाया जाए। काजीरंगा की प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए आसपास के समुदायों को विकास का अवसर देना ही किसी भी अंतिम व्यवस्था की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होगा।