हैदराबाद। हिजाब और यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों के साथ-साथ हिजाब से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले पर भी सवाल उठाए। ओवैसी ने उत्तराखंड, असम और गुजरात में UCC को लेकर चल रही कवायद पर अपनी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि कानूनों में एकरूपता लाना ही हर स्थिति में समानता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता के नाम पर मुस्लिम समुदाय के निजी और धार्मिक मामलों में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया जा रहा है। हिजाब के मुद्दे पर AIMIM प्रमुख ने अदालतों की भूमिका को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी अदालत को यह निर्धारित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि किसी धर्म में कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन-सी नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर ओवैसी की नाराजगी
ओवैसी ने प्रयागराज की एक स्कूली छात्रा की याचिका का जिक्र करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई। छात्रा ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया। इस फैसले को लेकर ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था से जुड़े सवालों पर अदालतों को यह तय करने की भूमिका नहीं निभानी चाहिए कि संबंधित धर्म में कौन-सी चीज अनिवार्य है। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान हिजाब पहनने वाली महिलाओं और छात्राओं के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि “सिर पर हिजाब है, दिमाग पर नहीं।” इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि हिजाब पहनना किसी महिला की सोच, समझ या बौद्धिक क्षमता को निर्धारित नहीं करता।
अनुच्छेद 19 और 25 का दिया हवाला
हिजाब के मुद्दे पर ओवैसी ने संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 25 का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा कि लोगों को अपनी धार्मिक मान्यताओं और आस्थाओं का पालन करने की संवैधानिक आजादी हासिल है। ओवैसी के मुताबिक, धार्मिक पहचान से जुड़े मामलों में राज्य और संस्थाओं को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को इसी संदर्भ में धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर अपनी असहमति जाहिर की। हालांकि, हिजाब से जुड़े मामलों में अदालतों के सामने धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों के ड्रेस कोड और प्रशासनिक नियमों का सवाल भी रहता है। यही वजह है कि ऐसे मामलों पर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बहस देखने को मिलती रही है।
UCC को लेकर ओवैसी ने सरकार से पूछे सवाल
हिजाब के साथ-साथ ओवैसी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने उत्तराखंड, असम और गुजरात में UCC लागू करने या उसकी दिशा में चल रही प्रक्रिया का जिक्र किया। ओवैसी ने सवाल उठाया कि यदि विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे मामलों से जुड़े मौजूदा प्रावधानों का बड़ा हिस्सा पहले से प्रचलित कानूनों की व्यवस्था पर आधारित है, तो उसे पूरी तरह 'यूनिफॉर्म' यानी समान नागरिक संहिता किस आधार पर कहा जा रहा है? उनका कहना था कि मुस्लिम समुदाय अपने निजी धार्मिक मामलों में कुरान और सुन्नत में बताए गए सिद्धांतों के अनुसार अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करता रहेगा। ओवैसी ने यह भी कहा कि उनकी नजर में धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत कानून से जुड़े मामलों में किसी तरह का दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
UCC को लेकर देश में जारी है राजनीतिक बहस
समान नागरिक संहिता लंबे समय से देश की राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण विषय रही है। इसके समर्थक इसे नागरिक कानूनों में समानता और एकरूपता से जोड़कर देखते हैं, जबकि विरोध करने वाले पक्षों की ओर से धार्मिक एवं व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। ओवैसी लंबे समय से UCC के प्रस्ताव और उससे जुड़ी नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। उनका ताजा बयान भी इसी राजनीतिक रुख की निरंतरता के तौर पर देखा जा रहा है। हिजाब विवाद के साथ UCC का मुद्दा जुड़ने के बाद यह बहस और अधिक राजनीतिक हो गई है। अलग-अलग राजनीतिक दल और नेता इसे संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और समानता के अलग-अलग नजरिए से देखते हैं।
'एनकाउंटर और बुलडोजर से मजहब खत्म नहीं होते'
अपने संबोधन में ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों का भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी सख्ती, एनकाउंटर या बुलडोजर जैसी कार्रवाई से किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता। ओवैसी ने इस संदर्भ में मुस्लिम समुदाय की धार्मिक पहचान और आस्था का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि किसी समुदाय के विश्वास को प्रशासनिक कार्रवाई या दबाव के माध्यम से खत्म नहीं किया जा सकता। इस दौरान उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का भी उल्लेख किया।
मौलवी अलाउद्दीन और तुर्रेबाज खान का किया जिक्र
ओवैसी ने अपने भाषण में मौलवी अलाउद्दीन और तुर्रेबाज खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई में अलग-अलग समुदायों के लोगों ने योगदान दिया था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए बलिदानों को याद करते हुए कहा कि देश के निर्माण में हर वर्ग की भूमिका रही है। उनका कहना था कि भारत की आजादी और विकास को किसी एक समुदाय के योगदान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। देश के निर्माण में विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोगों की भागीदारी रही है।
'मुसलमान देश की तरक्की में अपना योगदान देते रहेंगे'
ओवैसी ने अपने संबोधन के दौरान देशभक्ति और नागरिक अधिकारों के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमान भारत से प्रेम करते हैं और देश की आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ ही उन्होंने संविधान के तहत मिले अधिकारों की रक्षा करने की बात कही। उनके बयान का केंद्र यह रहा कि धार्मिक आस्था और भारतीय नागरिकता को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए देश के विकास में अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
हिजाब और UCC पर फिर तेज हो सकती है राजनीतिक बहस
ओवैसी के इस बयान के बाद हिजाब और UCC दोनों मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी तेज होने की संभावना है। एक तरफ हिजाब को लेकर अदालतों के फैसलों में धार्मिक स्वतंत्रता, संस्थागत अनुशासन और ड्रेस कोड जैसे पहलुओं पर चर्चा होती रही है। दूसरी तरफ UCC को लेकर व्यक्तिगत कानून, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक प्रश्न लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे में ओवैसी का ताजा बयान इन दोनों मुद्दों को एक साथ राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में इस पर अन्य राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने की संभावना है।
हिजाब विवाद में असली बहस किन मुद्दों पर?
हिजाब को लेकर होने वाली बहस केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसमें कई संवैधानिक और प्रशासनिक प्रश्न भी शामिल हैं। एक पक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी आस्था के अनुरूप पहनावे के अधिकार पर जोर देता है। वहीं दूसरा पक्ष शिक्षण संस्थानों में समान ड्रेस कोड और संस्थागत नियमों के पालन को महत्वपूर्ण मानता है। इसी तरह अदालतों के सामने यह प्रश्न भी आता है कि धार्मिक प्रथा की संवैधानिक सुरक्षा का दायरा क्या है और किसी संस्थान के नियमों के साथ उसका संतुलन कैसे बनाया जाए। यही कारण है कि हिजाब से जुड़े मामले अक्सर अदालतों और राजनीतिक मंचों दोनों पर चर्चा का विषय बन जाते हैं।
UCC पर क्या है विवाद?
UCC यानी Uniform Civil Code का मूल विचार यह है कि नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों से जुड़े कुछ कानूनों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था हो। भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे निजी मामलों से जुड़े अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। UCC के समर्थक इसे समान नागरिक अधिकारों और कानूनी एकरूपता की दिशा में कदम मानते हैं, जबकि आलोचक धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता तथा व्यक्तिगत कानूनों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताते हैं। ओवैसी का ताजा बयान इसी व्यापक बहस के विरोधी पक्ष को सामने रखता है।