नई दिल्ली. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की हालिया टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि “जेन-जी को मोहन भागवत जी से किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।” उनका यह बयान उस समय आया जब उनसे भागवत के लोकतंत्र और युवा पीढ़ी को लेकर दिए गए वक्तव्य पर प्रतिक्रिया मांगी गई। प्रियंका गांधी के इस बयान को कांग्रेस की ओर से युवा वर्ग के पक्ष में राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
क्या कहा था मोहन भागवत ने?
डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित 'इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशन्स' (IIMUN) के 15वें स्थापना वर्ष समारोह में लगभग दो हजार युवाओं, जिनमें Gen-Z और Gen Alpha के सदस्य शामिल थे, को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन की भूमिका पर अपने विचार रखते हुए कहा कि विरोध लोकतांत्रिक संवाद का एक वैध माध्यम है, लेकिन उसका उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि विभिन्न विचारों के बीच संवाद स्थापित कर सहमति बनाना होना चाहिए। उनके अनुसार लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि भिन्न मत चर्चा के माध्यम से साझा समाधान तक पहुंचें।
लोकतांत्रिक संवाद और विरोध की भूमिका पर छिड़ी बहस
मोहन भागवत की टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों में लोकतांत्रिक विरोध और उसकी सीमाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। एक पक्ष का मानना है कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध किसी भी स्वस्थ व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं, जबकि दूसरा पक्ष इस बात पर जोर देता है कि विरोध की प्रक्रिया शांतिपूर्ण, रचनात्मक और सामाजिक समरसता को बनाए रखने वाली होनी चाहिए। प्रियंका गांधी की प्रतिक्रिया इसी बहस के बीच सामने आई है, जिसमें उन्होंने युवा पीढ़ी की स्वतंत्र सोच और निर्णय क्षमता पर भरोसा जताया।
युवा पीढ़ी बनी राजनीतिक विमर्श का केंद्र
हाल के वर्षों में Gen-Z भारतीय राजनीति, सामाजिक आंदोलनों और डिजिटल विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरी है। रोजगार, शिक्षा, तकनीकी बदलाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर इस पीढ़ी की सक्रियता लगातार बढ़ी है। यही कारण है कि लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल और वैचारिक संगठन युवाओं से संवाद बढ़ाने और उनकी अपेक्षाओं को समझने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में युवा मतदाता चुनावी राजनीति और सार्वजनिक नीति निर्धारण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
‘जेन-जी’ और ‘जेन अल्फा’ कौन हैं?
सामाजिक और जनसांख्यिकीय वर्गीकरण के अनुसार वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को सामान्यतः Gen-Z कहा जाता है, जबकि 2013 से 2024 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी को Gen Alpha की श्रेणी में रखा जाता है। डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में पली-बढ़ी ये पीढ़ियां सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर अपेक्षाकृत अधिक जागरूक और सक्रिय मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इनकी प्राथमिकताएं पारंपरिक पीढ़ियों से काफी अलग हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल भी इनके साथ संवाद की नई रणनीतियां विकसित कर रहे हैं।
युवा राजनीति पर आगे भी बनी रह सकती है बहस
मोहन भागवत और प्रियंका गांधी के बयानों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि देश में युवाओं की भूमिका अब केवल मतदाता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे सार्वजनिक विमर्श के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संवाद और सामाजिक सहभागिता जैसे विषयों पर विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। आने वाले समय में यह बहस और व्यापक हो सकती है कि नई पीढ़ी के साथ संवाद का सबसे प्रभावी और लोकतांत्रिक तरीका क्या होना चाहिए तथा उनकी आकांक्षाओं को नीति निर्माण में किस प्रकार शामिल किया जाए।