Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में निकाय चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के सामने संगठन के भीतर से ही बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। अलवर में नगर निगम चुनाव के लिए टिकट वितरण को लेकर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष खुलकर सामने आ गया है। शहर के चार मंडलों में से दो मंडल अध्यक्षों ने अपनी पूरी कार्यकारिणी के साथ इस्तीफा दे दिया है। दोनों मंडल अध्यक्षों की ओर से अपना इस्तीफा भाजपा जिलाध्यक्ष अशोक गुप्ता को भेजा गया है। खास बात यह है कि इन दोनों मंडलों के अंतर्गत शहर के कुल 65 वार्डों में से 33 वार्ड आते हैं। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले संगठन के दो महत्वपूर्ण मंडलों में सामूहिक इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। विवेकानंद मंडल के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ के साथ 15 कार्यकारिणी सदस्यों ने इस्तीफा दिया है, जबकि केशव मंडल के अध्यक्ष महेश निहलानी समेत आठ पदाधिकारियों ने भी अपने पद से त्यागपत्र भेजा है।
33 वार्डों में संगठन संभालने वाले दो मंडल अध्यक्षों ने छोड़ा पद
अलवर शहर में भाजपा के चार मंडल बताए जा रहे हैं। इनमें से श्री विवेकानंद मंडल और श्री केशव मंडल के अध्यक्षों ने अपनी टीम के साथ इस्तीफा दिया है। श्री विवेकानंद मंडल के अंतर्गत 17 वार्ड आते हैं, जबकि श्री केशव मंडल 16 वार्डों को कवर करता है। यानी दोनों मंडलों को मिलाकर शहर के 33 वार्डों में पार्टी संगठन की जिम्मेदारी प्रभावित हुई है। चुनाव के ठीक पहले इतनी बड़ी संख्या में पदाधिकारियों के इस्तीफे को भाजपा के लिए संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
वार्ड 25 के टिकट को लेकर शुरू हुआ विवाद
श्री विवेकानंद मंडल के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ ने अपनी पत्नी हुकम कंवर के लिए वार्ड 25 से टिकट की मांग की थी। उनका आरोप है कि पार्टी ने उनकी मांग को दरकिनार करते हुए रमाकांत यादव को टिकट दे दिया। राठौड़ के मुताबिक, जिस वार्ड से टिकट दिया गया है, वह अनारक्षित महिला सीट है। ऐसे में उन्होंने टिकट वितरण के फैसले पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि रमाकांत यादव इससे पहले दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ते रहे हैं और इस बार उन्हें वार्ड 25 से प्रत्याशी बनाया गया है। टिकट को लेकर पैदा हुए इसी असंतोष के बाद जितेंद्र सिंह राठौड़ ने अपनी पूरी कार्यकारिणी के साथ इस्तीफा देने का फैसला किया।
विवेकानंद मंडल की पूरी कार्यकारिणी ने दिया इस्तीफा
भाजपा के श्री विवेकानंद मंडल के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ के साथ कार्यकारिणी के कुल 15 सदस्यों ने जिलाध्यक्ष को अपना इस्तीफा भेजा है। सामूहिक इस्तीफे से संकेत मिलता है कि नाराजगी केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि मंडल स्तर पर पार्टी के कुछ पदाधिकारी टिकट वितरण की प्रक्रिया से असंतुष्ट हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस मामले में आधिकारिक तौर पर क्या रुख अपनाया गया है, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। भाजपा जिलाध्यक्ष अशोक गुप्ता से मामले को लेकर फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो सकी।
केशव मंडल अध्यक्ष ने भी पार्टी की कार्यशैली पर उठाए सवाल
दूसरी ओर श्री केशव मंडल के अध्यक्ष महेश निहलानी ने भी अपनी कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ इस्तीफा भेजा है। महेश निहलानी के साथ कार्यकारिणी के आठ पदाधिकारियों ने जिलाध्यक्ष को अपना त्यागपत्र सौंपा है। उनकी नाराजगी का मुख्य कारण टिकट वितरण की प्रक्रिया बताई जा रही है। उनका कहना है कि पार्टी की बैठकों के दौरान यह बात कही गई थी कि प्रत्याशियों का चयन मंडल अध्यक्षों और कार्यकारिणी से चर्चा के बाद किया जाएगा। लेकिन उनके मुताबिक टिकट वितरण के दौरान इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसी बात को लेकर मंडल स्तर पर असंतोष बढ़ा और आखिरकार अध्यक्ष समेत कई पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया।
देर रात तक नाराज नेताओं को मनाने की कोशिश
सामूहिक इस्तीफों के बाद भाजपा संगठन में हलचल तेज हो गई। बताया जा रहा है कि देर रात तक पार्टी के कई नेता नाराज पदाधिकारियों से संपर्क कर उन्हें मनाने में जुटे रहे। चुनाव से ठीक पहले मंडल अध्यक्षों और कार्यकारिणी के पदाधिकारियों का इस्तीफा पार्टी के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि चुनावी अभियान में बूथ और वार्ड स्तर का संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में भाजपा की कोशिश होगी कि नाराज नेताओं को जल्द से जल्द साथ लाया जाए और संगठन में पैदा हुई खाई को चुनावी मैदान में उतरने से पहले पाटा जा सके।
वरिष्ठ भाजपाई सुरेश मेहता की सोशल मीडिया पोस्ट से भी बढ़ी चर्चा
टिकट वितरण को लेकर चल रही नाराजगी के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता सुरेश मेहता की सोशल मीडिया पोस्ट ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी है। सुरेश मेहता को वन राज्यमंत्री संजय शर्मा का करीबी माना जाता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पार्टी की कार्यशैली को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। अपनी पोस्ट में उन्होंने अनुभवी और पुराने नेताओं की जरूरत नहीं होने की बात कहते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा कि उन्हें घर बैठ जाना चाहिए, ताकि स्वार्थी और चापलूस लोगों को जगह मिल सके। उनकी इस पोस्ट को नगर निगम चुनाव में टिकट वितरण से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सुरेश मेहता ने अपनी पोस्ट में यह स्पष्ट नहीं किया कि उनकी नाराजगी किस खास फैसले या व्यक्ति को लेकर है। इसलिए उनकी पोस्ट के पीछे की वास्तविक वजह को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
OBC मोर्चा महामंत्री ने भी पार्टी से दिया इस्तीफा
अलवर भाजपा में असंतोष का एक और मामला सामने आया है। भाजपा ओबीसी मोर्चा के जिला महामंत्री विजेंद्र गुर्जर ने भी अपने पद के साथ-साथ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा भाजपा जिलाध्यक्ष को भेजा है। इस्तीफे में उन्होंने पार्टी के लिए लंबे समय से काम कर रहे जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कथित उपेक्षा को लेकर नाराजगी जताई है। विजेंद्र गुर्जर ने संगठन की मौजूदा कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कार्यकर्ताओं में लगातार असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि जब संगठन में समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान और उनकी बातों की रक्षा नहीं हो सके तो पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।
टिकट वितरण भाजपा के लिए बन रहा बड़ी चुनौती
नगर निगम चुनाव जैसे स्थानीय चुनावों में टिकट वितरण अक्सर राजनीतिक दलों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। वार्ड स्तर पर लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद रखते हैं। वहीं पार्टी नेतृत्व को जीत की संभावना, सामाजिक समीकरण, स्थानीय प्रभाव और संगठनात्मक संतुलन जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना पड़ता है। ऐसे में कुछ नेताओं को टिकट मिलने और कुछ के नाम कटने के बाद असंतोष पैदा होना आम बात है। लेकिन अलवर में जिस तरह एक साथ दो मंडल अध्यक्षों और उनकी कार्यकारिणियों ने इस्तीफा दिया है, उससे यह मामला सामान्य टिकट नाराजगी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है।
क्या चुनाव से पहले डैमेज कंट्रोल कर पाएगी BJP?
अब भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती नाराज नेताओं को दोबारा संगठन के साथ जोड़ने की होगी। चुनावी माहौल में पार्टी के स्थानीय पदाधिकारी और कार्यकर्ता प्रत्याशियों के प्रचार, बूथ प्रबंधन और मतदाताओं तक पहुंच बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर नाराजगी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। वहीं अगर पार्टी नेतृत्व समय रहते असंतुष्ट नेताओं से बातचीत कर समाधान निकाल लेता है, तो संगठनात्मक विवाद को चुनावी नुकसान में बदलने से रोका जा सकता है। फिलहाल अलवर में टिकट वितरण के बाद शुरू हुआ यह विवाद राजस्थान निकाय चुनाव से पहले भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम बन गया है।