देश में खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। फरवरी महीने से अब तक खाद्य तेलों की थोक कीमतों में करीब 13 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहले से ही पेट्रोल-डीजल, सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरतों की महंगाई झेल रहे परिवारों के लिए अब रसोई का खर्च और अधिक बढ़ने लगा है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई अस्थिरता का सीधा असर भारत के खाद्य तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल की कीमतों में लगातार दबाव बना हुआ है, जिससे घरेलू उपभोक्ताओं की मासिक लागत बढ़ती जा रही है।
पश्चिम एशिया युद्ध ने बढ़ाई वैश्विक चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने के कारण ट्रांसपोर्टेशन, बीमा और शिपिंग लागत में भारी उछाल देखा जा रहा है। तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों के लिए सुरक्षा खर्च बढ़ने से आयात लागत पर सीधा असर पड़ा है। भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला कोई भी संकट यहां की कीमतों को तेजी से प्रभावित करता है। यही वजह है कि वैश्विक तनाव का असर अब सीधे भारतीय उपभोक्ताओं की रसोई तक महसूस किया जाने लगा है।
रुपए की कमजोरी ने और बढ़ाई मुश्किल
खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी की एक बड़ी वजह भारतीय रुपए की कमजोरी भी मानी जा रही है। डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट आने से आयातित पाम तेल और अन्य वनस्पति तेल पहले की तुलना में अधिक महंगे पड़ रहे हैं। आयातकों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है, जिसका असर थोक बाजार से लेकर खुदरा बाजार तक दिखाई दे रहा है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यदि रुपए पर दबाव बना रहा तो आने वाले महीनों में खाद्य तेलों की कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ छोटे कारोबारियों और खाद्य उद्योग पर भी आर्थिक दबाव बढ़ेगा।
इंडोनेशिया की नीति से सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव
वैश्विक खाद्य तेल बाजार में नई चिंता इंडोनेशिया की बायोफ्यूल नीति को लेकर भी सामने आई है। इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े पाम तेल उत्पादकों में शामिल है और वहां 50 प्रतिशत पाम तेल मिश्रण वाले बायोफ्यूल कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक निर्यात के लिए उपलब्ध पाम तेल की मात्रा कम हो सकती है। यदि निर्यात घटता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव बनेगा और कीमतों में और तेजी आ सकती है। भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह स्थिति आने वाले समय में नई चुनौती पैदा कर सकती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब नई मार
भारत इससे पहले भी वैश्विक संघर्षों के कारण खाद्य तेल संकट का सामना कर चुका है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सूरजमुखी तेल की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी, जिससे घरेलू बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी थीं। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वनस्पति तेल बाजार में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार वैश्विक संकटों के कारण खाद्य तेलों की कीमतों में स्थिरता आना मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा बढ़ती ईंधन कीमतों ने किसानों की लागत और माल ढुलाई खर्च भी बढ़ा दिए हैं, जिसका असर खाद्य वस्तुओं की अंतिम कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
एफएमसीजी सेक्टर पर भी बढ़ा दबाव
खाद्य तेलों की महंगाई का असर अब एफएमसीजी सेक्टर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। नमकीन, बिस्कुट, बेकरी उत्पाद, फ्रोजन फूड और रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद नहीं उठा पाएंगी। यदि खाद्य तेलों की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं तो आने वाले समय में पैकेज्ड फूड उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इससे उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव और अधिक बढ़ने की आशंका है।
आम लोगों की रसोई पर बढ़ती जा रही मार
महंगाई के इस दौर में खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों ने मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। रसोई का मासिक खर्च लगातार ऊपर जा रहा है और रोजमर्रा की जरूरतों को संतुलित करना कठिन होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात जल्द नहीं सुधरे तो खाद्य तेलों के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रह सकते हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में घरेलू बजट पर दबाव और बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।