नई दिल्ली/कोलकाता: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले चल रहे मतदाता सूची विवाद पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव का खामियाजा आम मतदाताओं को भुगतना पड़ रहा है, जिससे उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित हो रही है।
मतदाता सूची विवाद पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सोमवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच खींचतान में आम नागरिक “पिस” रहे हैं। मामला उन मतदाताओं से जुड़ा है जिनके पास वैध पासपोर्ट होने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाए।
कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप से किया इनकार
हालांकि शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीधे दखल देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें उचित ट्रिब्यूनल के पास जाकर राहत लेनी चाहिए। साथ ही न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि प्रशासनिक या न्यायिक अधिकारियों से त्रुटि संभव है, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना उचित नहीं है।
SIR प्रक्रिया और लाखों वोटरों का मुद्दा
विवाद की जड़ पश्चिम बंगाल SIR प्रक्रिया है, जिसके तहत राज्य में बड़े पैमाने पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया। इस प्रक्रिया के कारण लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटने का दावा किया जा रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ये लोग 2026 के विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का उपयोग कर पाएंगे।
आंकड़ों में समझें पूरा विवाद
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में शुरुआत में करोड़ों मतदाता पंजीकृत थे। पुनरीक्षण के दौरान पहले चरण में ही लाखों नाम हटाए गए, जिसके बाद अंतिम सूची में भी बड़ी संख्या में कटौती की गई। सबसे अधिक विवाद उन मतदाताओं को लेकर है जो “अंडर एडजुडिकेशन” श्रेणी में थे, जिनमें से भी बड़ी संख्या को अंततः सूची से बाहर कर दिया गया। कुल मिलाकर करीब 90 लाख से अधिक नाम हटने की बात सामने आई है।
राजनीतिक और कानूनी नजरें फैसले पर टिकीं
इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी बेहद अहम है और इससे आगे की सुनवाई की दिशा तय हो सकती है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या अंतिम निर्देश देता है और क्या लाखों मतदाताओं का अधिकार बहाल हो पाएगा।