पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर 13 याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि यह मामला अभी “समय से पहले” लाया गया है और पहले संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल का रुख किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं को ट्रिब्यूनल जाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले से ही अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunals) की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें वहीं पर अपने सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करना चाहिए। अदालत ने यह भी दोहराया कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
30 से 34 लाख अपीलें लंबित
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से बताया गया कि राज्य में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ लगभग 30 से 34 लाख अपीलें लंबित हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा गठित ट्रिब्यूनल्स पर पहले से ही भारी बोझ है, जहां हर ट्रिब्यूनल में एक लाख से अधिक मामलों की सुनवाई चल रही है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मतदाता को दो संवैधानिक संस्थाओं—निर्वाचन आयोग और न्यायिक प्रणाली—के बीच फंसना नहीं चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि वोट देने का अधिकार केवल कानूनी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक और भावनात्मक अधिकार भी है।
चुनावी प्रक्रिया पर हस्तक्षेप नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से बाहर किया गया है या चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ रहा है, तब तक चुनाव को बाधित नहीं किया जाएगा।
अब आगे क्या होगा?
अब याचिकाकर्ताओं को कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा गठित ट्रिब्यूनल्स में अपने दावे रखने होंगे। ट्रिब्यूनल में इस मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी है और आगे इसी स्तर पर विवादों का निपटारा किया जाएगा।