ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ धाम को सनातन धर्म के चार प्रमुख धामों में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां की अनेक धार्मिक परंपराएं अन्य वैष्णव मंदिरों से भिन्न मानी जाती हैं। पूरे भारत में जहां एकादशी के दिन अन्न, विशेषकर चावल का सेवन वर्जित माना जाता है, वहीं श्रीजगन्नाथ मंदिर में इसी दिन भगवान को चावल का महाभोग अर्पित किया जाता है। यही नहीं, श्रद्धालुओं को भी महाप्रसाद के रूप में चावल वितरित किया जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है।
ब्रह्मा और महाप्रसाद से जुड़ी है यह पौराणिक कथा
लोकमान्य परंपरा के अनुसार एक बार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भगवान जगन्नाथ के दर्शन और महाप्रसाद ग्रहण करने पुरी पहुंचे। मंदिर पहुंचने तक अधिकांश महाप्रसाद समाप्त हो चुका था। केवल कुछ चावल के दाने एक पत्ते पर बचे थे, जिन्हें एक कुत्ता खा रहा था। भगवान के महाप्रसाद को सर्वोच्च मानते हुए ब्रह्मा ने उसी कुत्ते के साथ बैठकर वे चावल ग्रहण कर लिए। इस प्रसंग को भगवान के प्रसाद की महिमा और समानता के भाव का प्रतीक माना जाता है।
एकादशी माता ने जताई आपत्ति, तब भगवान ने दिया संदेश
कथा के अनुसार उसी समय एकादशी माता वहां प्रकट हुईं और ब्रह्मा से कहा कि एकादशी के दिन चावल का सेवन व्रत के नियमों का उल्लंघन है। तभी भगवान जगन्नाथ वहां प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि उनका महाप्रसाद सभी सांसारिक नियमों और तिथियों से परे है। भगवान ने स्पष्ट किया कि जहां सच्ची श्रद्धा और भक्ति होती है, वहां केवल बाहरी नियमों की नहीं, बल्कि भाव की प्रधानता होती है। इस संदेश को जगन्नाथ परंपरा का मूल आधार माना जाता है।
एकादशी माता के उल्टे स्वरूप की मान्यता
इसी लोककथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ ने एकादशी माता को मंदिर के पीछे उल्टे स्वरूप में स्थापित कर दिया। मान्यता है कि इसके बाद से पुरी धाम में एकादशी के दिन भी भगवान को चावल का भोग अर्पित करने और महाप्रसाद वितरित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। श्रद्धालु इसे इस बात का प्रतीक मानते हैं कि भगवान के प्रसाद पर किसी तिथि या व्रत का प्रतिबंध लागू नहीं होता और ईश्वर के प्रति समर्पण सर्वोपरि है।
आस्था और परंपरा के बीच क्या है वास्तविक दृष्टिकोण?
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह प्रसंग मुख्यतः स्थानीय धार्मिक परंपरा और लोकमान्यता पर आधारित है। विभिन्न पुराणों और संप्रदायों में इस कथा का वर्णन अलग-अलग रूपों में मिलता है तथा सभी शास्त्रों में इसका समान उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए श्रद्धालु इसे ऐतिहासिक तथ्य की बजाय आस्था, परंपरा और भगवान जगन्नाथ की विशिष्ट धार्मिक मान्यता के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि पुरी धाम की यह परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए गहरी श्रद्धा और आध्यात्मिक विश्वास का विषय बनी हुई है।