सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। इसी दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना से वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत रखती हैं। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों, निष्ठा और दांपत्य जीवन की पवित्रता का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इस व्रत से वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस वर्ष कब रखा जाएगा व्रत?
वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 29 जून 2026 को प्रातः 03 बजकर 06 मिनट पर प्रारंभ होगी और 30 जून 2026 को प्रातः 05 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत 29 जून 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इस दिन देशभर में विवाहित महिलाएं व्रत, पूजा और वट वृक्ष की परिक्रमा कर अपने परिवार के सुख और पति की मंगल कामना करेंगी। धार्मिक दृष्टि से यह दिन अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
वट वृक्ष क्यों माना जाता है अमरता का प्रतीक?
भारतीय संस्कृति में वट अर्थात बरगद के वृक्ष को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है। इसकी विशाल जड़ें, लंबी आयु और सदैव हरा-भरा रहने का स्वभाव इसे अमरता, स्थायित्व और संरक्षण का प्रतीक बनाता है। शास्त्रों में इसे त्रिदेवों का निवास भी माना गया है। यही कारण है कि वट सावित्री व्रत में बरगद के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान बताया गया है। मान्यता है कि इस वृक्ष की आराधना से परिवार में स्थिरता, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
विधि-विधान से ऐसे करें व्रत और पूजा
वट सावित्री पूर्णिमा के दिन व्रती महिलाओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और सोलह श्रृंगार धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद पूजा सामग्री को एकत्रित कर वट वृक्ष के समीप जाना चाहिए। वहां सावित्री और सत्यवान के चित्र या प्रतिमा स्थापित कर रोली, चंदन, सिंदूर, पुष्प, धूप और दीप से पूजा करनी चाहिए। श्रद्धापूर्वक फल, वस्त्र और श्रृंगार सामग्री अर्पित करने के बाद वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटना चाहिए। यह प्रक्रिया पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की मजबूती का प्रतीक मानी जाती है।
सावित्री और सत्यवान की अमर कथा का संदेश
वट सावित्री व्रत का आधार सावित्री और सत्यवान की वह प्रेरणादायी कथा है, जिसमें सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और बुद्धिमत्ता से यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यह कथा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है बल्कि नारी शक्ति, समर्पण और अटूट विश्वास का भी संदेश देती है। सावित्री का चरित्र भारतीय संस्कृति में आदर्श पत्नी के रूप में पूजनीय माना जाता है और इसी कारण इस व्रत का महत्व सदियों से अक्षुण्ण बना हुआ है।
अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि का महापर्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री पूर्णिमा व्रत करने से अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख, पारिवारिक समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह व्रत पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और आपसी सम्मान को मजबूत करने का माध्यम भी माना जाता है। श्रद्धालु महिलाओं का विश्वास है कि इस दिन की गई पूजा और उपासना से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं तथा परिवार पर देवी-देवताओं की विशेष कृपा बनी रहती है।
आधुनिक समय में भी कायम है परंपरा की आस्था
समय के साथ जीवनशैली में भले ही अनेक परिवर्तन आए हों, लेकिन वट सावित्री पूर्णिमा की आस्था आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है। शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक महिलाएं पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करती हैं। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवित रखता है, जिसमें परिवार, संबंध और आध्यात्मिक मूल्यों को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यही कारण है कि हर वर्ष यह व्रत नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।