देश में डेयरी क्षेत्र केवल दूध उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब मूल्य संवर्धित दुग्ध उत्पादों का बाजार भी तेज़ी से विस्तार कर रहा है। पनीर, दही, घी, मक्खन और अन्य दुग्ध उत्पादों की बढ़ती मांग ने डेयरी उद्यमिता को नई दिशा दी है। इसके बावजूद पनीर जैसे उत्पादों की सीमित शेल्फ लाइफ लंबे समय से डेयरी उद्योग की सबसे बड़ी चुनौतियों में रही है। पनीर के शीघ्र खराब होने के कारण छोटे डेयरी उत्पादकों से लेकर बड़े प्रसंस्करण इकाइयों तक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल के वैज्ञानिकों ने एक अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है, जिससे पनीर को अधिक समय तक सुरक्षित और ताज़ा रखा जा सकेगा।
एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फॉर्मूलेशन ने खोले नई संभावनाओं के द्वार
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फॉर्मूलेशन (AMCF) डेयरी विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। सामान्यतः पनीर बनाने के लिए प्रयुक्त कोएगुलेंट केवल दूध को फाड़कर ठोस रूप देने का कार्य करता है, जबकि यह नया फॉर्मूलेशन दोहरी भूमिका निभाता है। यह दूध को पनीर में परिवर्तित करने के साथ-साथ प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल एजेंट की तरह भी कार्य करता है। परिणामस्वरूप पनीर में सूक्ष्मजीवों की वृद्धि नियंत्रित रहती है, जिससे उसकी गुणवत्ता, ताजगी और खाद्य सुरक्षा लंबे समय तक बनी रहती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक पनीर की शेल्फ लाइफ को लगभग दस दिनों तक बढ़ाने में प्रभावी सिद्ध हो सकती है।
छोटे और मध्यम डेयरी उद्यमियों के लिए वरदान साबित हो सकती है तकनीक
देश के लाखों छोटे और मध्यम डेयरी उद्यमी प्रतिदिन सीमित मात्रा में पनीर तैयार करते हैं। परिवहन, विपणन या अपेक्षित बिक्री न होने की स्थिति में पनीर शीघ्र खराब हो जाता है, जिससे उन्हें प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। नई तकनीक इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकती है। यदि पनीर अधिक समय तक सुरक्षित रहेगा तो उत्पादकों को उसे दूरस्थ बाजारों तक पहुँचाने, बेहतर मूल्य प्राप्त करने तथा बिक्री की योजना अधिक प्रभावी ढंग से बनाने का अवसर मिलेगा। इससे उत्पाद की बर्बादी घटेगी और डेयरी कारोबार की लाभप्रदता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव होगी।
बढ़ती मांग के बीच आधुनिक तकनीक की आवश्यकता हुई और अधिक महत्वपूर्ण
पिछले कुछ वर्षों में देश में पनीर की खपत लगातार बढ़ी है। घरेलू रसोई से लेकर होटल, रेस्तरां, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और संगठित खुदरा बाजार तक इसकी मांग में निरंतर विस्तार देखा गया है। बढ़ती उपभोक्ता मांग के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित पनीर की उपलब्धता सुनिश्चित करना डेयरी उद्योग की प्रमुख आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे समय में यह तकनीक न केवल उत्पादन प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक बनाएगी, बल्कि उपभोक्ताओं तक अधिक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पहुँचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
खाद्य सुरक्षा और अपव्यय में कमी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
खाद्य सुरक्षा आज विश्व स्तर पर एक गंभीर विषय बन चुका है। दुग्ध उत्पादों की खराब होने की प्रवृत्ति के कारण प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में खाद्य अपव्यय होता है। यदि पनीर की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है तो खाद्य अपव्यय में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, उत्पादन लागत घटेगी और उपभोक्ताओं को भी अधिक सुरक्षित खाद्य उत्पाद उपलब्ध होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की तकनीकें भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध होंगी।
विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश के लिए नई उपलब्धि
भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और डेयरी क्षेत्र करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार बना हुआ है। ऐसे में दुग्ध प्रसंस्करण तकनीकों में होने वाले नवाचार किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पूरे कृषि अर्थतंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित यह तकनीक भविष्य में डेयरी उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकती है। यदि इसका व्यापक स्तर पर व्यावसायिक उपयोग प्रारम्भ होता है तो पनीर उत्पादन की गुणवत्ता, विपणन क्षमता और निर्यात संभावनाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे डेयरी किसानों, प्रसंस्करण इकाइयों और उपभोक्ताओं—सभी को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।