पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है, लेकिन इसकी आर्थिक और संपत्ति संबंधी व्यवस्था भी उतनी ही व्यापक है। श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन की ओर से जारी ताजा जानकारी के अनुसार मंदिर के बैंक खातों में कुल करीब ₹1,911.80 करोड़ जमा हैं और मंदिर के नाम देशभर में 60,821 एकड़ जमीन दर्ज है। इसके अलावा रत्न भंडार में सदियों पुराने सोने, चांदी, हीरे और दूसरे कीमती रत्नों से जड़े आभूषण मौजूद हैं। खास बात यह है कि रत्न भंडार की नई गणना और अभिलेखीकरण की प्रक्रिया 2026 में 48 साल के अंतराल के बाद फिर शुरू हुई है। इसलिए मंदिर की कुल संपत्ति का वास्तविक मौद्रिक मूल्य बैंक जमा और जमीन के आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकता है, हालांकि रत्न भंडार में रखी वस्तुओं का मौद्रिक मूल्यांकन मौजूदा प्रक्रिया का उद्देश्य नहीं है।
बैंक खातों में जमा हैं करीब ₹1,912 करोड़
श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन के अनुसार 31 अगस्त 2026 तक मंदिर के पास ₹1,811.10 करोड़ की राशि सावधि जमा के रूप में मौजूद थी। इसमें ₹1,311.10 करोड़ अलग-अलग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा हैं, जबकि ₹500 करोड़ ओडिशा सरकार की ओर से दिए गए कॉर्पस फंड का हिस्सा हैं। इसके अलावा मंदिर के बचत, चालू और फ्लेक्सी खातों में ₹100.71 करोड़ की राशि मौजूद थी। इन सभी रकम को जोड़ने पर मंदिर की कुल बैंक जमा राशि ₹1,911.80 करोड़ पहुंचती है। मंदिर प्रशासन के मुताबिक इन निधियों को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए सुरक्षित रखा जाता है और मंदिर के नियमित खर्चों की पूर्ति मंदिर कोष से की जाती है।
आखिर इतनी बड़ी कमाई आती कहां से है?
श्रीजगन्नाथ मंदिर की आय केवल श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाए जाने वाले दान या हुंडी तक सीमित नहीं है। मंदिर प्रशासन के अनुसार आय के प्रमुख स्रोतों में भक्तों का दान, मंदिर के स्वामित्व वाली खदानों और खनिज संपत्तियों से होने वाली आमदनी, सावधि जमा पर मिलने वाला ब्याज, जमीन की बिक्री और उससे जुड़े लेन-देन तथा सरकार से मिलने वाले अनुदान शामिल हैं। मंदिर प्रशासन के अनुसार आय के एक हिस्से को कॉर्पस फंड और फाउंडेशन फंड के रूप में सावधि जमा में सुरक्षित रखा जाता है, जबकि शेष राशि मंदिर के नियमित संचालन में इस्तेमाल होती है। हुंडी से मिलने वाले चढ़ावे की गणना प्रतिदिन की जाती है और इसकी जानकारी सार्वजनिक माध्यमों से साझा करने की व्यवस्था भी बताई गई है।
60,821 एकड़ जमीन, कई राज्यों में फैली संपत्ति
मंदिर की सबसे बड़ी चल-अचल संपत्तियों में उसकी जमीन शामिल है। श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन के अनुसार मंदिर के नाम देशभर में कुल 60,821 एकड़ जमीन दर्ज है। इसमें 60,426 एकड़ जमीन अकेले ओडिशा के 24 जिलों में फैली हुई है, जबकि 395 एकड़ जमीन देश के 6 अन्य राज्यों में स्थित है। जमीन का यह विशाल रकबा अपने आप में मंदिर की संपत्ति के व्यापक स्वरूप को दिखाता है। हालांकि इस पूरी जमीन को एक ही स्थान पर स्थित मानना सही नहीं होगा, क्योंकि यह अलग-अलग जिलों और राज्यों में फैली हुई संपत्तियों का कुल योग है। इसलिए इसकी तुलना किसी एक शहर के क्षेत्रफल से करते समय यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि मंदिर की जमीन एक जगह जुड़ी हुई नहीं है।
नोएडा से बड़ी बताई जा रही जमीन, लेकिन तुलना में सावधानी जरूरी
60,821 एकड़ जमीन को वर्ग किलोमीटर में बदलने पर इसका क्षेत्रफल करीब 246 वर्ग किलोमीटर बैठता है। इसी वजह से इसकी तुलना नोएडा के करीब 203 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से की जा रही है। आंकड़ों के स्तर पर यह तुलना आकर्षक जरूर है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि श्रीजगन्नाथ मंदिर की पूरी जमीन नोएडा जैसे किसी एक शहर के रूप में एक ही स्थान पर मौजूद है। मंदिर की संपत्तियां अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई हैं और उनकी प्रकृति, उपयोग तथा कानूनी स्थिति भी अलग हो सकती है। इसलिए 246 वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा केवल कुल रकबे का गणितीय रूपांतरण है, न कि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में मौजूद लगातार जमीन का आकार।
रत्न भंडार में क्या है, 48 साल बाद क्यों हो रही गणना?
श्रीजगन्नाथ मंदिर का रत्न भंडार लंबे समय से देशभर में चर्चा का विषय रहा है। 2026 में इसकी नई गणना 48 साल के अंतराल के बाद शुरू की गई। 25 मार्च 2026 से शुरू हुई प्रक्रिया में आभूषणों की गिनती, वजन, पहचान, छायांकन और डिजिटल अभिलेखीकरण किया जा रहा है तथा पुराने 1978 के रिकॉर्ड से उनका मिलान किया जा रहा है। इस काम में मंदिर प्रशासन के अधिकारियों के साथ स्वर्णकार, रत्न विशेषज्ञ, बैंक अधिकारी और भारतीय रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि भी शामिल रहे हैं। प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक जैसे 3D मानचित्रण और वीडियो रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल भी किया जा रहा है।
रत्न भंडार की दौलत का अभी नहीं हुआ मौद्रिक मूल्यांकन
रत्न भंडार को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता इस बात की है कि उसमें मौजूद सोने, चांदी और रत्नों की कुल कीमत कितनी है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मौजूदा प्रक्रिया का उद्देश्य इन प्राचीन आभूषणों और बहुमूल्य वस्तुओं की संख्या, वजन, पहचान और रिकॉर्ड तैयार करना है, न कि तत्काल उनका बाजार मूल्य तय करना। 1978 में हुई पिछली गणना से तुलना भी इसी दस्तावेजी और संरक्षण संबंधी उद्देश्य से की जा रही है। इसलिए अभी ₹1,911.80 करोड़ की बैंक जमा राशि और 60,821 एकड़ जमीन का आंकड़ा स्पष्ट रूप से उपलब्ध है, लेकिन रत्न भंडार में रखे खजाने को जोड़कर मंदिर की कुल संपत्ति का कोई आधिकारिक मौद्रिक आंकड़ा सामने नहीं आया है।
1978 के रिकॉर्ड से हो रहा हर आभूषण का मिलान
नई गणना की खासियत यह है कि इसमें केवल आभूषणों की गिनती नहीं की जा रही, बल्कि उन्हें पुराने अभिलेखों से मिलाया भी जा रहा है। रत्न भंडार के अलग-अलग हिस्सों में दैनिक उपयोग, प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों और लंबे समय से सुरक्षित रखे गए आभूषणों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। मार्च में दैनिक उपयोग वाले आभूषणों से प्रक्रिया शुरू हुई और बाद के चरणों में बाहरी तथा आंतरिक रत्न भंडार की वस्तुओं का दस्तावेजीकरण किया गया। अधिकारियों ने बताया है कि इस प्रक्रिया में प्रत्येक वस्तु का वजन और स्वरूप दर्ज करने के साथ डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है। इस तरह 48 साल बाद होने वाली यह गणना केवल संपत्ति की गिनती नहीं, बल्कि मंदिर की ऐतिहासिक धरोहर को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का भी बड़ा प्रयास है।
मंदिर की संपत्ति का असली महत्व सिर्फ पैसों में नहीं
श्रीजगन्नाथ मंदिर की संपत्ति को केवल बैंक जमा, जमीन या सोने की कीमत से देखना इस विरासत की पूरी तस्वीर नहीं देता। मंदिर से जुड़ी संपत्तियों का संबंध सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, पूजा व्यवस्था, सेवायत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से भी है। बैंक में जमा राशि मंदिर के प्रशासन और भविष्य की जरूरतों के लिए आर्थिक आधार देती है, जमीन उसकी दीर्घकालिक संपत्ति का हिस्सा है और रत्न भंडार ऐतिहासिक तथा धार्मिक धरोहर का प्रतीक है। यही कारण है कि रत्न भंडार की मौजूदा प्रक्रिया में पारदर्शिता, अभिलेखीकरण और संरक्षण को विशेष महत्व दिया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और संपन्न धार्मिक संस्थानों में से एक है, लेकिन इसकी वास्तविक विरासत का मूल्य केवल रुपये में तय करना संभव नहीं है।