किराए पर घर तलाशने के बाद लोग अक्सर जल्दी से घर में शिफ्ट होने की तैयारी शुरू कर देते हैं। इसी जल्दबाजी में कई किरायेदार रेंट एग्रीमेंट की शर्तों को ठीक से पढ़े बिना ही उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं। बाद में जब किराया बढ़ाने, डिपॉजिट वापस करने या मकान की मरम्मत को लेकर विवाद होता है, तब यही दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण बन जाता है।
इसलिए एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले उसकी हर शर्त को ध्यान से पढ़ना चाहिए। जो बातें मकान मालिक ने बातचीत के दौरान कही हैं, उन्हें भी संभव हो तो लिखित रूप में एग्रीमेंट का हिस्सा बनवाना बेहतर है। इससे भविष्य में मौखिक वादों को लेकर होने वाले विवाद से बचने में मदद मिल सकती है।
किराया, डिपॉजिट और अवधि जरूर जांचें
रेंट एग्रीमेंट में मासिक किराया, सिक्योरिटी डिपॉजिट, किरायेदारी की अवधि और नोटिस पीरियड स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए। एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले यह जांच लें कि उसमें दर्ज रकम और अवधि वही है, जिस पर मकान मालिक से सहमति हुई थी। इसके अलावा लॉक-इन पीरियड होने पर उससे जुड़ी शर्तों को भी अच्छी तरह समझना जरूरी है।
किराया कब और किन परिस्थितियों में बढ़ाया जा सकता है, यह भी एग्रीमेंट में स्पष्ट होना चाहिए। अगर किराया बढ़ाने की कोई तय अवधि या दर है तो उसे लिखित रूप में दर्ज कराना बेहतर है। इससे किरायेदारी के दौरान अचानक बढ़े किराए को लेकर विवाद की संभावना कम हो जाती है।
सिक्योरिटी डिपॉजिट की शर्त सबसे अहम
मकान खाली करते समय किरायेदार और मकान मालिक के बीच सबसे ज्यादा विवादों में से एक सिक्योरिटी डिपॉजिट की वापसी को लेकर होता है। इसलिए एग्रीमेंट में यह साफ लिखा होना चाहिए कि कितनी रकम जमा की गई है और घर खाली करने के बाद इसे कितने समय में वापस किया जाएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मकान मालिक किन परिस्थितियों में डिपॉजिट से रकम काट सकता है।
केंद्र सरकार के Model Tenancy Act में रिहायशी संपत्तियों के लिए अधिकतम 2 महीने के किराए के बराबर सिक्योरिटी डिपॉजिट का प्रावधान है। हालांकि यह मॉडल कानून है और राज्यों में लागू किराया कानून अलग हो सकते हैं। इसलिए संबंधित राज्य के नियमों और एग्रीमेंट की शर्तों को ध्यान से समझना जरूरी है।
छोटी और बड़ी मरम्मत की जिम्मेदारी तय करें
घर में नल खराब होने, बिजली की समस्या आने, पाइपलाइन में खराबी या किसी बड़ी टूट-फूट की स्थिति में खर्च कौन उठाएगा, यह पहले से तय होना चाहिए। रोजमर्रा के छोटे रखरखाव और बड़ी मरम्मत की जिम्मेदारी अलग-अलग स्पष्ट होने से बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद की स्थिति कम हो सकती है।
घर में शिफ्ट होने से पहले दीवारों, फर्श, दरवाजों, फर्नीचर और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक सामान की तस्वीरें या वीडियो बनाकर सुरक्षित रखना भी उपयोगी है। इससे पहले से मौजूद नुकसान को लेकर मकान खाली करते समय किरायेदार पर गलत जिम्मेदारी डालने की स्थिति से बचने में मदद मिल सकती है।
मौखिक वादों पर नहीं, लिखित शर्तों पर भरोसा करें
अगर मकान मालिक ने पार्किंग देने, कोई सामान बदलने, किराया कुछ समय तक नहीं बढ़ाने या किसी अन्य सुविधा का वादा किया है तो उसे एग्रीमेंट में शामिल कराना बेहतर है। केवल बातचीत में कही गई बातों के आधार पर निर्णय लेने से भविष्य में परेशानी हो सकती है।
पालतू जानवर रखने की अनुमति, मेंटेनेंस शुल्क, बिजली-पानी का बिल, सोसाइटी शुल्क और अन्य खर्चों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। खास तौर पर सोसाइटी में रहने वाले किरायेदारों को यह पहले ही पता कर लेना चाहिए कि कौन-सा शुल्क मकान मालिक देगा और किसका भुगतान किरायेदार को करना होगा।
भुगतान और दस्तावेजों का रिकॉर्ड रखें
किराए और सिक्योरिटी डिपॉजिट का भुगतान करने के बाद उसकी रसीद, बैंक लेनदेन या अन्य उपलब्ध भुगतान रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना चाहिए। इससे भविष्य में भुगतान को लेकर किसी तरह का विवाद होने पर प्रमाण के रूप में रिकॉर्ड मौजूद रहेगा। एग्रीमेंट की प्रति भी सुरक्षित स्थान पर रखनी चाहिए।
घर खाली करते समय दोनों पक्षों की मौजूदगी में मीटर रीडिंग, चाबियों की वापसी और मकान की स्थिति का रिकॉर्ड तैयार करना उपयोगी रहेगा। अगर डिपॉजिट से कोई रकम काटी जा रही है तो उसके कारण को भी लिखित रूप में दर्ज कराना बेहतर है। शुरुआत में एग्रीमेंट पढ़ने और हर शर्त स्पष्ट करने में थोड़ा समय जरूर लगता है, लेकिन यही सावधानी बाद में पैसे और अनावश्यक विवाद दोनों से बचा सकती है।