भोपाल: मध्य प्रदेश में सेवा और परोपकार से जुड़ी ‘आनंदम’ पहल को नए तरीके से सक्रिय करने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य आनंद संस्थान द्वारा प्रदेश के अलग-अलग शहरों में संचालित 170 आनंदम केंद्रों को आनंद क्लबों को गोद देने की योजना बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य संसाधनों और देखरेख के अभाव में निष्क्रिय पड़े केंद्रों को दोबारा सक्रिय करना और जरूरतमंद लोगों तक मदद को व्यवस्थित तरीके से पहुंचाना है। नई व्यवस्था में सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया जाएगा। इसके लिए प्रदेश के जिलों को 10-10 जिलों के क्लस्टर में बांटकर आनंदम केंद्रों के संचालन और निगरानी की व्यवस्था बेहतर करने की तैयारी है।
करीब एक दशक पहले शुरू हुई थी आनंदम पहल
राज्य आनंद संस्थान ने करीब एक दशक पहले प्रदेश में वंचित और अभावग्रस्त लोगों की सहायता के उद्देश्य से आनंदम केंद्रों की शुरुआत की थी। इस पहल के पीछे समाज में मौजूद सेवा, सहयोग और जरूरतमंदों की मदद की परंपरा को बढ़ावा देने की सोच थी। इसका विचार ईरान में प्रचलित ‘कॉफी इन द वॉल’ कॉन्सेप्ट से प्रेरित बताया जाता है। इसी सोच को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ‘नेकी की दीवार’ और ‘आनंदम’ जैसे स्वरूप में आगे बढ़ाया गया।
संसाधनों और देखरेख के अभाव में निष्क्रिय हुए केंद्र
जानकारी के अनुसार, समय के साथ कई जिलों में आनंदम केंद्र और नेकी की दीवारें संसाधनों की कमी और नियमित देखरेख नहीं होने के कारण निष्क्रिय हो गईं। कई केंद्र खुले स्थानों पर संचालित होने के कारण भी व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण रहा।
कुछ जगह लोगों ने घर में उपयोग नहीं आने वाले कपड़े, किताबें, घरेलू सामान और अन्य वस्तुएं केंद्रों पर रखीं, लेकिन जरूरतमंद लोगों तक इन सामानों के व्यवस्थित वितरण की व्यवस्था नहीं बन पाई।
अब इनडोर कैंपस में संचालन पर जोर
नई व्यवस्था के तहत आनंदम केंद्रों को इनडोर कैंपस में संचालित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केंद्रों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ वहां उपलब्ध सामग्री के संग्रह और वितरण की व्यवस्था को बेहतर बनाना है। संस्थान के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन केंद्रों को दोबारा सक्रिय करना है, जहां अभी भी नियमित गतिविधियां नहीं हो पा रही हैं या केंद्र लंबे समय से बंद हैं।
आनंद क्लबों को मिल सकती है जिम्मेदारी
आनंदम केंद्रों को सक्रिय बनाने में आनंद क्लबों की महत्वपूर्ण भूमिका तय की जा रही है। संस्थान का मानना है कि आनंद क्लबों से जुड़े आनंदक, युवा, शिक्षक, समाजसेवी और वॉलंटियर्स स्थानीय स्तर पर जरूरतमंदों की पहचान और मदद का काम बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
नई व्यवस्था को लेकर विभाग की ओर से जिलों के वॉलंटियर्स और एनजीओ की वर्कशॉप भी आयोजित की जा रही है। इसके जरिए केंद्रों के संचालन, सामुदायिक भागीदारी और सेवा गतिविधियों को लेकर जरूरी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे।
‘जॉय ऑफ गिविंग’ को मिलेगा नया स्वरूप
आनंद क्लबों के जरिए ‘जॉय ऑफ गिविंग’ यानी देने की खुशी और ‘मदद से आनंद’ की अवधारणा को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की तैयारी है। इसका मूल विचार यह है कि लोगों के घरों में अतिरिक्त पड़ा सामान किसी जरूरतमंद के काम आ सके।
इसके तहत कोई भी व्यक्ति अपने घर के अतिरिक्त कपड़े, किताबें, खिलौने, बर्तन, जूते-चप्पल और उपयोगी घरेलू सामान आनंदम केंद्र पर छोड़ सकता है। जरूरतमंद व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार वहां से सामान ले सकता है। इस पूरी व्यवस्था में देने वाले और लेने वाले के बीच औपचारिकता या पूछताछ कम से कम रखने की भावना है, ताकि मदद लेने वाले व्यक्ति को किसी तरह की असहजता महसूस न हो।
सेवा और सुविधा पर रहेगा फोकस
राज्य आनंद संस्थान के डायरेक्टर सत्य प्रकाश आर्य के अनुसार, नई व्यवस्था में आनंदम केंद्रों को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ सेवा और सुविधा सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा। 170 केंद्रों को सामुदायिक भागीदारी से जोड़ने की योजना सफल रहती है तो लंबे समय से निष्क्रिय पड़े कई केंद्रों को फिर से नियमित गतिविधियों का केंद्र बनाया जा सकता है। इससे ‘नेकी की दीवार’ की मूल भावना—जरूरतमंद तक बिना संकोच मदद पहुंचाना और देने वाले को सेवा का आनंद देना—को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।