उज्जैन: गणेशोत्सव को लेकर शहर में तैयारियां तेज हो गई हैं। जगह-जगह पंडाल सजने लगे हैं और गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस बार ईको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं खास आकर्षण का केंद्र बनने वाली हैं। इनमें सबसे खास 21 फीट ऊंची हल्दी से तैयार की जा रही गणेश प्रतिमा है, जिसे जेन-जी के युवा मिलकर आकार दे रहे हैं। इस प्रतिमा की खास बात यह है कि इसमें करीब 3.5 क्विंटल खड़ी हल्दी का इस्तेमाल किया गया है। प्रतिमा को तैयार करने में करीब 3 महीने लगे हैं और 10 कारीगर इसके निर्माण से जुड़े रहे। इसकी अनुमानित लागत करीब 3 लाख रुपए बताई गई है। प्रतिमा की स्थापना महाकाल मंदिर के गेट नंबर-4 पर की जाएगी।
हरिद्र गणेश की अवधारणा से आया आइडिया
महाकाल इंटरनेशनल संस्था से जुड़े ऋषभ बाबू यादव के अनुसार, भगवान गणेश को हरिद्र गणेश भी कहा जाता है। इसी धार्मिक अवधारणा से प्रेरणा लेकर इस बार गणेश प्रतिमा को हल्दी से सजाने का विचार आया। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष लौंग और इलायची से गणेश प्रतिमा का श्रृंगार किया गया था। हर साल कुछ नया करने की कोशिश की जाती है। इस बार हल्दी का इस्तेमाल कर प्रतिमा को अलग रूप देने के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का प्रयास किया गया है।
3.5 क्विंटल हल्दी और 3 लाख की लागत
21 फीट ऊंची इस प्रतिमा को तैयार करने में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।
| खासियत |
जानकारी |
| प्रतिमा की ऊंचाई |
21 फीट |
| खड़ी हल्दी |
3.5 क्विंटल |
| अनुमानित लागत |
3 लाख रुपए |
| कारीगर |
10 |
| निर्माण अवधि |
करीब 3 महीने |
| स्थापना स्थल |
महाकाल मंदिर गेट नंबर-4 |
आयोजकों का कहना है कि प्रतिमा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को ध्यान में रखते हुए इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाने की कोशिश की गई है।
कौड़ी, नारियल और ड्रायफ्रूट से भी बन रही प्रतिमाएं
जेन-जी के युवा इस बार गणेश प्रतिमाओं में पारंपरिक सामग्री के साथ कई प्राकृतिक और अपशिष्ट सामग्रियों का प्रयोग कर रहे हैं। हल्दी के अलावा कौड़ी, नारियल के छिलके और रेशे, ड्रायफ्रूट तथा अन्य प्राकृतिक अवशेषों से भी प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। एक प्रतिमा में करीब 11 किलो कौड़ियों का इस्तेमाल किया जाएगा। वहीं नारियल थीम वाली प्रतिमा में नारियल के छिलके, रेशे और अन्य बची हुई सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। इस पहल का मकसद धार्मिक परंपरा को आधुनिक सोच के साथ जोड़ना और लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है।
तीसरी पीढ़ी संभाल रही मूर्ति निर्माण की जिम्मेदारी
प्रतिमा निर्माण से जुड़े कारीगर परिवार के लिए यह काम नई पीढ़ी तक पहुंच चुका है। बताया गया कि तीसरी पीढ़ी गणेश प्रतिमा निर्माण के काम से जुड़ी हुई है। मूर्तियों को तैयार करने में गंगा, क्षिप्रा और कानपुर की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य तौर पर 3 से 15 फीट तक की गणेश प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। विशेष ऑर्डर मिलने पर इससे बड़ी प्रतिमाएं भी तैयार की जाती हैं। कारीगरों के मुताबिक, इस बार कुल पांच प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है। इनमें तीन प्रतिमाएं इंदौर और दो उज्जैन के लिए तैयार की जा रही हैं।
पहले लौंग-इलायची से किया जा चुका है श्रृंगार
प्रतिमा निर्माण से जुड़े कारीगर ने बताया कि इस बार हल्दी से प्रतिमा तैयार करने का सुझाव क्लाइंट की ओर से दिया गया था। इससे पहले भी टीम इलायची और लौंग से गणेश प्रतिमाओं का श्रृंगार कर चुकी है। हर साल प्रतिमाओं में कुछ नया प्रयोग करने का प्रयास किया जाता है। इस बार हल्दी, कौड़ी, नारियल और ड्रायफ्रूट जैसी सामग्रियों के इस्तेमाल से तैयार प्रतिमाएं धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग का संदेश देंगी।
परंपरा और पर्यावरण का संगम
गणेशोत्सव में प्रतिमा के साथ भगवान को अर्पित की जाने वाली सामग्री का भी धार्मिक महत्व होता है। आयोजकों का मानना है कि यदि ऐसी प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाए, जो विसर्जन के बाद पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक हो, तो आस्था और पर्यावरण संरक्षण दोनों उद्देश्यों को साथ लेकर चला जा सकता है। इसी सोच के साथ इस बार उज्जैन में 21 फीट की हल्दी वाली गणेश प्रतिमा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने जा रही है।