नई दिल्ली: दुनिया में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बार फिर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यूरोपीय जलवायु निगरानी संस्था कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के मुताबिक, अगस्त 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक दर्ज सबसे गर्म अगस्त रहा। संस्था ने बताया कि यह तापमान रिकॉर्ड 2023 के जुलाई में दर्ज किए गए असाधारण स्तर के बराबर रहा। C3S के अनुसार, अगस्त के दौरान वैश्विक औसत तापमान औद्योगीकरण-पूर्व स्तर से 1.65 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। खास बात यह है कि नवंबर 2025 के बाद पहली बार किसी महीने का वैश्विक औसत तापमान औद्योगीकरण-पूर्व औसत से 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ऊपर दर्ज किया गया है।
ग्लोबल वार्मिंग के पीछे क्या है बड़ी वजह?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, धरती के बढ़ते तापमान के पीछे सबसे बड़ा कारण मानव गतिविधियों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन है। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है।
इसके अलावा इस समय उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की मजबूत स्थिति विकसित हो रही है, जो वैश्विक तापमान को और बढ़ाने में भूमिका निभा रही है। अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है।
समुद्र की सतह का तापमान भी रिकॉर्ड स्तर पर
C3S ने अगस्त के दौरान समुद्र की सतह के तापमान को लेकर भी गंभीर आंकड़े जारी किए हैं। संस्था के मुताबिक, ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान 21.07 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह आंकड़ा अगस्त 2023 के पिछले रिकॉर्ड 20.98 डिग्री सेल्सियस से अधिक है। यानी समुद्र की सतह भी लगातार गर्म हो रही है और यह बदलाव जलवायु प्रणाली पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
समुद्र का बढ़ता तापमान समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, मछलियों और अन्य समुद्री जीवों के साथ-साथ तूफानों और अत्यधिक मौसम की घटनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
अल नीनो ने बढ़ाई चिंता
C3S के मुताबिक, उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में इस समय मजबूत अल नीनो विकसित हो रहा है। इससे महासागर में मौजूद गर्मी और बढ़ रही है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो को केवल इस तापमान वृद्धि का कारण नहीं माना जा सकता। इसके पीछे लंबे समय से जारी मानव-जनित जलवायु परिवर्तन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। समुद्र पहले से ही कई दशकों से ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्म हो रहे हैं और अल नीनो इस प्राकृतिक बदलाव को कुछ समय के लिए और तेज कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र ने जताई गंभीर चिंता
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव साइमन स्टिल ने बढ़ते तापमान को लेकर चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि जब तक बड़े पैमाने पर कोयला, तेल और गैस के इस्तेमाल को कम नहीं किया जाता, तब तक इनसे होने वाला प्रदूषण धरती को गर्म करता रहेगा। उनके मुताबिक, अत्यधिक गर्मी की घटनाएं लगातार रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं। इसका असर मानव जीवन के साथ-साथ परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है। जलवायु संकट के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान का दायरा भी आने वाले समय में बढ़ सकता है।
1.5 डिग्री की सीमा क्यों है अहम?
पेरिस जलवायु समझौते में देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगीकरण-पूर्व स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और संभव हो तो 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रयास का लक्ष्य तय किया था। किसी एक महीने का तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर पहुंचना इस लक्ष्य के औपचारिक रूप से स्थायी रूप से पार होने के बराबर नहीं है। लेकिन ऐसे लगातार रिकॉर्ड इस बात का संकेत जरूर देते हैं कि वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने की चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है।
क्या है चिंता की सबसे बड़ी वजह?
- अगस्त 2026 में वैश्विक औसत तापमान औद्योगीकरण-पूर्व स्तर से 1.65°C अधिक रहा।
- यह नवंबर 2025 के बाद पहली बार है जब मासिक औसत तापमान 1.5°C की सीमा से ऊपर गया।
- समुद्र की सतह का औसत तापमान 21.07°C के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।
- अगस्त 2023 का समुद्री तापमान रिकॉर्ड भी पीछे छूट गया।
- प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो विकसित हो रहा है।
- जीवाश्म ईंधन से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण बना हुआ है।
नोट: किसी एक महीने का 1.5°C से अधिक गर्म होना पेरिस समझौते की दीर्घकालिक तापमान सीमा के स्थायी रूप से पार होने का प्रमाण नहीं है। दीर्घकालिक औसत इसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।