इंग्लैंड और वेल्स के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में कुल 5,85,396 बच्चों का जन्म दर्ज किया गया। यह संख्या वर्ष 2024 की तुलना में भी कम है और 1976 के बाद सबसे निम्न स्तर मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि लंबे समय से जारी जनसांख्यिकीय बदलाव का संकेत है। बीते कुछ दशकों में जन्मदर में लगातार कमी देखी गई है, जिससे भविष्य में श्रमशक्ति, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक विकास पर प्रभाव पड़ सकता है।
महंगाई और बढ़ती लागत बन रही बड़ी वजह
विश्लेषकों के अनुसार ब्रिटेन में बढ़ती जीवन-यापन लागत लोगों को परिवार बढ़ाने से रोक रही है। घर खरीदने की ऊंची कीमतें, बढ़ता किराया, बच्चों की शिक्षा और देखभाल पर बढ़ता खर्च युवा दंपतियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आर्थिक अनिश्चितता के कारण अनेक परिवार बच्चे पैदा करने का निर्णय टाल रहे हैं या कम बच्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही कारण है कि विकसित देशों में दिखने वाली कम जन्मदर की प्रवृत्ति अब ब्रिटेन में भी और स्पष्ट होती जा रही है।
देर से माता-पिता बनने का बढ़ता चलन
ब्रिटेन में लोगों के माता-पिता बनने की औसत उम्र लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2025 में मां बनने की औसत उम्र 31.1 वर्ष और पिता बनने की औसत उम्र 34 वर्ष दर्ज की गई। इसकी तुलना में वर्ष 1975 में महिलाओं की औसत मातृत्व आयु 26.4 वर्ष और पुरुषों की औसत पितृत्व आयु 29.5 वर्ष थी। उच्च शिक्षा, करियर निर्माण, आर्थिक स्थिरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देने के कारण लोग अब जीवन के अपेक्षाकृत बाद के चरण में परिवार शुरू कर रहे हैं।
विदेशी मूल के परिवारों का बढ़ता योगदान
ताजा आंकड़ों ने ब्रिटेन की बदलती सामाजिक संरचना की भी तस्वीर पेश की है। वर्ष 2025 में जन्मे लगभग 40 प्रतिशत बच्चों के माता-पिता में से कम से कम एक व्यक्ति विदेश में जन्मा था। यह अब तक का सर्वाधिक स्तर माना जा रहा है। विशेष रूप से लंदन और उसके आसपास के क्षेत्रों में विदेशी मूल के परिवारों की भूमिका काफी बढ़ गई है। कई इलाकों में अधिकांश नवजात ऐसे परिवारों से जुड़े हैं जिनकी जड़ें ब्रिटेन के बाहर हैं।
भारतीय मूल के माता-पिता सबसे आगे
विदेशी मूल के माता-पिता में भारतीय समुदाय सबसे प्रमुख बनकर उभरा है। लगातार तीसरे वर्ष भारतीय मूल की माताओं और पिताओं की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई। इसके बाद पाकिस्तानी और नाइजीरियाई मूल के परिवारों का स्थान रहा। यह आंकड़ा ब्रिटेन में भारतीय समुदाय की बढ़ती जनसंख्या, आर्थिक भागीदारी और सामाजिक प्रभाव को भी दर्शाता है। भारतीय मूल के परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और तकनीकी क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति के साथ ब्रिटिश समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
भविष्य के लिए चुनौती बन सकती है घटती जन्मदर
जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जन्मदर में गिरावट का यह रुझान जारी रहा तो आने वाले वर्षों में ब्रिटेन को वृद्ध होती आबादी, कार्यबल की कमी और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में सरकारों को परिवारों के लिए आर्थिक सहायता, सस्ती चाइल्डकेयर सुविधाएं और आवास संबंधी नीतियों को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि युवा पीढ़ी परिवार बढ़ाने के प्रति अधिक आश्वस्त महसूस कर सके।