कोलकाता: भारत के पूर्व राष्ट्रीय क्रिकेटर और बीजेपी विधायक अशोक डिंडा ने पश्चिम बंगाल की नई सरकार में मंत्री के रूप में शपथ ले ली है। लोक भवन में शपथ ग्रहण करने के बाद डिंडा ने राज्य की खेल व्यवस्था को लेकर अपनी प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं। उन्होंने संकल्प लिया है कि अब बंगाल के खेल जगत में किसी भी तरह का भाई-भतीजावाद (Nepotism) नहीं चलेगा और सिर्फ योग्यता के आधार पर ही खिलाड़ियों को मौका मिलेगा।
"ममता के भाई 8 खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे थे"
शपथ लेने के बाद एक विशेष साक्षात्कार में अशोक डिंडा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के कार्यकाल के दौरान खेल व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों पर जमकर निशाना साधा। डिंडा ने कहा:"पिछली सरकार के समय क्या होता था, यह सबने देखा है। ममता बनर्जी के भाई होने के नाते एक व्यक्ति सात से आठ खेल संघों (Sports Organizations) के सर्वेसर्वा बने बैठे थे। क्या उन्हें खेलों की कोई समझ थी? इसकी वजह से बंगाल का खेल जगत पूरी तरह बर्बाद हो रहा था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अमीर हो या गरीब, जो योग्य होगा, उसे ही मौका मिलेगा।"
डिंडा ने साफ किया कि खेलों में सुधार के लिए मंत्री पद की जरूरत नहीं होती, क्योंकि खेल उनके दिल में बसता है। हालांकि, नई जिम्मेदारी मिलने के बाद वे बंगाल की प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे।
"मेरे खिलाफ आर्म्स एक्ट का झूठा केस दर्ज कराया गया था"
विपक्ष में रहते हुए पिछले पांच सालों के संघर्ष को याद कर डिंडा भावुक हो गए। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी सरकार ने विपक्ष की आवाज दबाने के लिए उन पर कई झूठे मुकदमे दर्ज कराए थे।
उन्होंने कहा, "विपक्ष में रहकर लड़ना हमेशा मुश्किल होता है, खासकर टीएमसी जैसे शासक के खिलाफ। उन्होंने मुझ पर 6-7 झूठे केस किए। आप सोच सकते हैं, एक पूर्व राष्ट्रीय क्रिकेटर, जिसने देश के लिए अपनी जान लगा दी, उस पर आर्म्स एक्ट (Arms Act) के तहत मामला दर्ज किया गया था! लेकिन मैंने एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ी और आज इस संघर्ष का पुरस्कार मिला है।"
लक्ष्मीरतन शुक्ला और मनोज तिवारी से अलग है मेरी लड़ाई
जब डिंडा से पूछा गया कि उनसे पहले भी लक्ष्मीरतन शुक्ला और मनोज तिवारी जैसे क्रिकेटर राज्य सरकार में खेल राज्य मंत्री रह चुके हैं, तो डिंडा ने कहा, "उनकी और मेरी लड़ाई में जमीन-आसमान का अंतर है। वे सत्ताधारी दल में रहकर मंत्री बने थे। मैं पांच साल तक सड़क पर विपक्ष के रूप में लड़ने के बाद यहां पहुंचा हूं, इसका संतोष अलग है। मैंने खुद को एसी कमरों में बंद नहीं रखा, जनता के बीच जाकर काम किया है।"
पत्नी के कहने पर कुर्ता-पायजामा पहनकर पहुंचे
अशोक डिंडा ने अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता और पत्नी को दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि वे पहले शर्ट-पेंट पहनकर ही शपथ लेने जाने वाले थे, लेकिन पत्नी की जिद के कारण उन्होंने कुर्ता-पायजामा पहना। डिंडा ने कहा कि जब वे देश के लिए खेलते थे, तब वे अपनी बेटी के जन्म के समय भी घर पर मौजूद नहीं थे। परिवार ने उनके लिए बहुत त्याग किया है और आज का दिन उनके पूरे परिवार के लिए बेहद खास है।
विभागों के बंटवारे पर उन्होंने कहा कि अभी कोई अंतिम बात नहीं हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के मार्गदर्शन में वे बंगाल को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए चौबीसों घंटे दौड़ने को तैयार हैं।