कोलकाता। पश्चिम बंगाल में शराब वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से लागू की गई डिपो-डिस्ट्रिब्यूटर व्यवस्था अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। खुदरा शराब लाइसेंसधारकों के बीच लंबे समय से यह शिकायत सामने आती रही है कि सरकार द्वारा निर्धारित मुफ्त डोरस्टेप डिलीवरी व्यवस्था के बावजूद उनसे अतिरिक्त डिलीवरी शुल्क वसूला जा रहा है। अब उपलब्ध आंकड़ों और उद्योग से जुड़े सूत्रों के दावों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। राज्य सरकार द्वारा जारी गजट अधिसूचना के अनुसार डिपो से खुदरा दुकानों तक शराब उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी वितरकों को सौंपी गई थी। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य यह था कि खुदरा विक्रेताओं को परिवहन संबंधी किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ का सामना न करना पड़े और उन्हें निर्धारित स्थान पर उत्पादों की निर्बाध आपूर्ति मिल सके। लेकिन आरोप है कि इस प्रावधान के बावजूद वास्तविकता में कई वितरक खुदरा विक्रेताओं से अलग से डिलीवरी चार्ज वसूल रहे हैं।
बीयर सप्लाई पर करोड़ों रुपये की कथित वसूली
खुदरा व्यापारियों का दावा है कि विशेष रूप से बीयर की आपूर्ति पर प्रति केस लगभग 10 रुपये तक की राशि ली जाती रही है। आरोप यह भी है कि अधिकांश मामलों में यह राशि नकद रूप से ली जाती है और इसके बदले कोई आधिकारिक रसीद, बिल अथवा लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं कराया जाता। यदि यह दावा सही है तो यह न केवल सरकारी नीति की भावना के विपरीत है बल्कि वित्तीय पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उपलब्ध डिपो डिस्पैच आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2023 से वर्ष 2025 के बीच बीयर की आपूर्ति पर ही करोड़ों रुपये की अतिरिक्त वसूली की गई हो सकती है।
- वर्ष 2023 : 2,36,36,000 केस – अनुमानित वसूली ₹23.63 करोड़
- वर्ष 2024 : 2,40,00,000 केस – अनुमानित वसूली ₹24.00 करोड़
- वर्ष 2025 : 2,17,03,366 केस – अनुमानित वसूली ₹21.70 करोड़
इस प्रकार केवल बीयर श्रेणी में ही तीन वर्षों के दौरान लगभग 70 करोड़ रुपये की राशि खुदरा विक्रेताओं से वसूले जाने की आशंका जताई जा रही है।
विदेशी मदिरा श्रेणी में भी वसूली के आरोप
मामला केवल बीयर तक सीमित नहीं बताया जा रहा। खुदरा विक्रेताओं का आरोप है कि विदेशी मदिरा (Foreign Liquor) की आपूर्ति पर भी विभिन्न प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं। कहीं प्रति केस तीन रुपये तक और कहीं प्रति चालान या बिल के आधार पर निर्धारित राशि वसूले जाने की बात सामने आई है। जबकि इस श्रेणी में भी डोरस्टेप डिलीवरी को सेवा का अनिवार्य हिस्सा माना गया है। उद्योग जगत से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि बीयर और विदेशी मदिरा दोनों श्रेणियों की कथित वसूली को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा 100 करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकता है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी सरकारी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से मुफ्त डोरस्टेप डिलीवरी का प्रावधान मौजूद है, तो उसके बावजूद किसी भी प्रकार की अतिरिक्त वसूली की जांच होना आवश्यक है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्या वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ है अथवा वितरण व्यवस्था में कोई ऐसी व्यावहारिक समस्या है जिसकी वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई। मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता से जुड़ा है। यदि किसी सेवा के बदले कोई शुल्क लिया जाता है तो उसका लेखा-जोखा, बिलिंग और कर संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन खुदरा विक्रेताओं के आरोप हैं कि कई मामलों में कोई दस्तावेज जारी नहीं किया जाता, जिससे पूरी प्रक्रिया पर संदेह और गहरा जाता है।
जांच की मांग, विभागों की भूमिका पर निगाहें
अब निगाहें संबंधित विभागों और नियामक एजेंसियों पर टिकी हैं। व्यापारिक संगठनों और लाइसेंसधारकों का मानना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि सरकार की मंशा के अनुरूप पारदर्शी और जवाबदेह वितरण व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल करोड़ों रुपये की कथित वसूली का मामला नहीं होगा, बल्कि सरकारी नीति के क्रियान्वयन, नियामकीय निगरानी और व्यापारिक पारदर्शिता से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न भी बन सकता है।
(नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध आंकड़ों, उद्योग सूत्रों और खुदरा लाइसेंसधारकों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)